मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी

मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी

मेरो मनमोहना, आयो नहीं सखी री
मेरो मनमोहना, आयो नहीं सखी री॥
कैं कहुं काज किया संतन का, कै कहुं गैल भुलावना॥
कहा करूं कित जाऊं मेरी सजनी, लाग्यो है बिरह सतावना॥
मीरा दासी दरसण प्यासी, हरिचरणां चित लावना॥
 


 
Krishna Bhajan | हे मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी री | Kishori Amonkar | Meera Bai | Sahitya Tak
 
हृदय में प्रभु के लिए तीव्र विरह की व्याकुलता है, जो मन को बेचैन किए हुए है। जैसे प्यासा जल के बिना तड़पता है, वैसे ही आत्मा हरि के दर्शन को तरस रही है। संतों की संगति और उनके उपदेश मन को राह दिखाते हैं, पर प्रभु का अभाव एक गहरी पीड़ा बनकर सताता है।

यह व्यथा तब और गहरी हो जाती है, जब मन समझ नहीं पाता कि क्या करे, कहाँ जाए। मीरा का दास्य भाव यही है कि वह हरि के चरणों में चित्त लगाकर, उनके दर्शन की प्यास बुझाना चाहती है। सच्ची भक्ति वही, जो प्रभु के प्रति ऐसी तड़प जगा दे, जहाँ मन केवल उनके चरणों में ही शांति पाए, और आत्मा परम आनंद में लीन हो जाए। 

बिरह की वेदना ऐसी होती है कि हृदय हर क्षण उसी प्रियतम के आने की राह देखता है। यह प्रेम केवल भावनाओं की लहर नहीं, बल्कि आत्मा की गहरी पुकार है, जो उसे प्रभु के सान्निध्य के लिए व्याकुल कर देती है। जब वह नहीं आते, तो मन स्वयं से ही प्रश्न करता है—क्या किसी अन्य कर्तव्य ने उन्हें रोक लिया, या यह मात्र भाग्य का विलंब है?

संतों की सेवा, साधना और सत्संग सब महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जब हृदय प्रेम की पराकाष्ठा तक पहुँच जाता है, तब किसी भी तर्क से उसकी व्याकुलता कम नहीं होती। यह वह दशा है, जहाँ प्रेम केवल धैर्य नहीं मांगता, बल्कि स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर देता है।

यह वह अवस्था है, जहाँ मीरा की आत्मा केवल दर्शन के लिए तड़पती है—हरि के चरणों में चित्त लगाना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बन जाता है। जब यह प्रेम अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, तब संसार की प्रत्येक बात गौण हो जाती है, और केवल उस प्रियतम का स्मरण शेष रहता है। यही भक्ति की वास्तविक अनुभूति है, जहाँ प्रेम और प्रतीक्षा एकाकार हो जाते हैं।
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