हे मातृभूमि तेरे चरणों में सिर नवाऊँ

हे मातृभूमि तेरे चरणों में सिर नवाऊँ

हे मातृभूमि
हे मातृभूमि ! तेरे चरणों में सिर नवाऊँ ।
मैं भक्ति भेंट अपनी, तेरी शरण में लाऊँ ।

माथे पे तू हो चन्दन, छाती पे तू हो माला;
जिह्वा पे गीत तू हो, तेरा ही नाम गाऊँ ।

जिससे सपूत उपजें, श्रीराम-कृष्ण जैसे ;
उस धूल को मैं तेरी निज शीश पे चढ़ाऊँ ।

माई समुद्र जिसकी पदरज को नित्य धोकर;
करता प्रणाम तुझको, मैं वे चरण दबाऊँ ।

सेवा में तेरी माता ! मैं भेदभाव तजकर;
वह पुण्य नाम तेरा, प्रतिदिन सुनूँ सुनाऊँ ।

तेरे ही काम आऊँ, तेरा ही मन्त्र गाऊँ ।
मन और देह तुझ पर बलिदान मैं चढ़ाऊँ ।


सुंदर भजन में मातृभूमि के प्रति अटूट भक्ति और समर्पण का उद्गार हृदय को स्पर्श करता है। जैसे कोई भक्त अपने आराध्य के चरणों में सिर झुकाकर पूर्ण शरणागति स्वीकार करता है, वैसे ही देशवासी अपनी मातृभूमि के प्रति पूर्ण निष्ठा अर्पित करते हैं। यह भाव धर्मज्ञान की उस शिक्षा को प्रदर्शित करता है कि मातृभूमि की सेवा ही सच्चा तप है।

मातृभूमि की महिमा ऐसी है कि वह माथे का चंदन और हृदय की माला बनकर सजती है। उसका नाम जिह्वा पर गीत बनकर गूंजता है, जैसे नदी अपनी धारा में सदा बहती है। यह प्रेम चिंतन की उस गहराई से उपजता है, जो मानता है कि देश का नाम ही जीवन का सबसे मधुर संगीत है।

उस पवित्र मिट्टी का स्पर्श, जिसने श्रीराम और श्रीकृष्णजी जैसे सपूतों को जन्म दिया, हृदय में श्रद्धा जागृत करता है। उस धूल को मस्तक पर धारण करना गर्व का प्रतीक है, जैसे संत अपनी साधना को सबसे बड़ा आभूषण मानता है।

समुद्र भी मातृभूमि की पवित्रता को नित्य प्रणाम करता है, और उसकी सेवा में हर देशवासी अपने कर्तव्य को सहर्ष अपनाता है। यह भाव धर्मगुरु की उस सीख को रेखांकित करता है कि सच्ची सेवा वही है, जो निस्वार्थ भाव से की जाए।

मातृभूमि की सेवा में भेदभाव का कोई स्थान नहीं। उसका नाम हर दिन स्मरण करना और दूसरों को सुनाना पुण्य का कार्य है, जैसे सूर्य हर प्रभात में विश्व को उजाला देता है। यह उद्गार संत की वाणी की तरह निर्मल है, जो कहती है कि प्रेम में ही जीवन का सार है।

मातृभूमि के लिए मन और देह का समर्पण करना सर्वोच्च बलिदान है। उसका मंत्र गाना और उसके लिए जीना ही जीवन का ध्येय है। यह विश्वास चिंतक के विचारों से प्रेरित है, जो कहता है कि देश के लिए किया गया हर कार्य अमर हो जाता है। मातृभूमि के प्रति यह भक्ति हर हृदय को उसके कर्तव्यपथ पर अग्रसर करती है।

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