मेरे चंचल किशोर प्यारे आजाओ भजन

मेरे चंचल किशोर प्यारे आजाओ माखन चोर भजन

मेरे चंचल किशोर,
प्यारे आजाओ माखन चोर,
प्यारे आजाओ माखन चोर,
मेरे नटवर नंदकिशोर,
प्यारे माखन चोर।

कभी अवध बिहारी राम बने,
कभी अर्जुन के रखवार बने,
हाय कृष्ण मुरारी,
मधुसूदन आओ-आओ प्यारे मनमोहन।
मेरी अर्जी प्रभु, हाथ जोड़,
प्रभु आ जाओ माखन चोर,
मेरे नटवर नंदकिशोर...

यमुना में जब विचधर बाजे,
सिर पर चढ़कर नटवर नाचे,
तेरी मधुर मुरलिया सुन-सुन के,
सखियां अपनी धुन में नाचे।
वृंदावन के चितचोर प्यारे,
आ जाओ माखन चोर,
मेरे चंचल किशोर...

तुम ही गोवर्धन गिरधारी,
नंदनंद, कान्हा बनवारी,
जय रास रचइया नंदलाल,
तेरी सांवली सूरत बड़ी प्यारी।
मुरलीधर नंदकिशोर,
प्यारे आ जाओ माखन चोर,
मेरे नटवर नंदकिशोर...

मेरी नैया डगमग डोले है,
दुखों के साये घेरें हैं,
मेरे कान्हा, दर्शन दिखा जाओ,
हरी आ जाओ, हरी आ जाओ।
अब इतने बनो न कठोर,
प्यारे आ जाओ माखन चोर,
मेरे नटवर नंदकिशोर...


Mere Chanchal Kishor Pyare Aa Jao Makhan Chor

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Mere Chanchal Kishor Pyare Aa Jao Makhan Chor · Kumar Vishu
 
यह भजन भक्ति की गहन पुकार और कृष्णजी के दिव्य स्वरूप की आराधना का अनुपम उदगार है। प्रभु की लीला का स्मरण कर हृदय में उनकी उपस्थिति की अनुभूति होती है। भक्त अपनी प्रेम भरी विनती में श्रीकृष्णजी को विविध रूपों में निहारता है—कभी माखन चोर, कभी नटवर, तो कभी अर्जुन के सारथी के रूप में। यह पुकार केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों से उठती हुई भावनाओं का प्रतिबिंब है।

कृष्णजी की लीलाएँ अनंत हैं। वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, गोवर्धन को उठाने वाले हैं, रासलीला में आनन्द देने वाले हैं। उनकी मुरलिया जब गूंजती है, तो केवल प्रकृति ही नहीं, हृदय भी नृत्य करने लगता है। उनकी माधुरी, उनकी करुणा और उनकी शरण में आने की चाह, इन पंक्तियों में गहराई से झलकती है।

जीवन की कठिनाइयाँ जब मार्ग को अवरुद्ध करती हैं, तब एकमात्र आश्रय वही हैं। डगमगाती नैया को किनारे लगाने वाले वही प्रभु हैं। जब दुःख घेरता है, तब वह प्रेममयी पुकार और अधिक गहन हो जाती है। यह भजन केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार है, जो श्रीकृष्णजी को प्रेम से आमंत्रित करती है।

कृष्णजी की महिमा को जानने वाला मन उनकी ओर स्वतः ही खिंचता चला जाता है। यह भाव केवल सगुण भक्ति की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा भी है। जब भक्त उन्हें अपने हृदय में धारण करता है, तब वह संसार की बाधाओं से मुक्त होकर दिव्य प्रेम की अनुभूति करता है। इस भजन में यही अनुभूति है—एक आत्मा की पुकार, जो श्रीकृष्णजी की चरणों में विश्राम चाहती है।
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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