उर में णाख चोर गड़े मीराबाई भजन

उर में णाख चोर गड़े मीराबाई भजन

मीरा भजन उर में णाख चोर गड़े।
अब कैसेहुँ निकसत निहं ऊधों, तिरछै ह्व जे अड़े।
णेणा बणज बसावाँ री, म्हारा साँवरा आवाँ।।टेक।।
णैणा म्हौला साँवरा राज्याँ, डरताँ पलक णा लावाँ।
म्हाँरां हिरवाँ बस्ताँ मुरारी, पल पल दरसण पावाँ।
स्याम मिलण सिंगार सजावाँ, सुखरी सेज बिछायाँ।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर बार सार बलि जावाँ।।
 
 (बणज=कमल के समान कोमल, पलक णा लावाँ=पलक न मारना,आँखें खुली ही रखना) 

Ur Me Naakh Chor Gade Meera Bai Padawali

 
सुंदर भजन में मीरा बाई की श्रीकृष्ण (साँवरिया) के प्रति गहरी भक्ति, प्रेम और विरह की तड़प का उद्गार झलकता है, जो भक्त के हृदय को उनके प्रेम के रस में डुबो देता है। यह भाव उस सत्य को प्रकट करता है कि श्रीकृष्ण मीरा के हृदय में एक चोर की तरह बसे हैं, जिन्हें निकालना असंभव है।

मीरा का यह कहना कि साँवरिया उनके उर में तिरछी नजरों से गड़े हैं और अब निकलने का नाम नहीं लेते, उनकी उस अनन्य भक्ति को दर्शाता है, जो हर पल उनके प्रति समर्पित है। यह उद्गार मन को उस अनुभूति से जोड़ता है, जैसे कोई प्रेमी अपने प्रिय की स्मृति में हर पल खोया रहता है। मीरा की आँखों में साँवरिया का बसेरा और पलक न मारने की चाह उनकी तीव्र दर्शन-लालसा को रेखांकित करती है।

नैना में साँवरिया का राज करना और हर पल उनका दर्शन पाना मीरा के लिए सबसे बड़ा सुख है। यह भाव उस सत्य को उजागर करता है कि सच्चा भक्त अपने प्रभु को हर पल अपने हृदय और नयनों में बसाए रखता है। जैसे कोई विद्यार्थी अपने गुरु की सीख को हर क्षण याद रखता है, वैसे ही मीरा का मन साँवरिया के प्रेम में लीन है, जो उनके लिए हरे वस्त्र और सेज सजाने का प्रेरणा-स्रोत है।

मीरा का स्याम के मिलन के लिए सिंगार सजाना और सुख की सेज बिछाना उनके प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा को दर्शाता है। यह उद्गार हर उस भक्त को प्रेरित करता है, जो अपने जीवन को प्रभु के प्रेम में अर्पित करना चाहता है। मीरा की यह पुकार कि वह गिरधरनागर के लिए बार-बार बलि जाएँ, उनकी पूर्ण भक्ति और आत्म-समर्पण को दर्शाती है। 

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