ऐसी लगन लगाइ कहां तू जासी भजन

ऐसी लगन लगाइ कहां तू जासी भजन

मीरा भजन ऐसी लगन लगाइ कहां तू जासी ।।टेक।।
तुम देखे बिन कलि न परति है, तलफि तलफि जिव जासी।
तेरे खातिर जोगण हूँगा करबत लूँगी कासी।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, चरण केवल की दासी।।

(लगन=प्रेम, जासी=जाता है, कलि न परति है=चैन नहीं मिलता है, जिव=जी,प्राण, करबत,करवत=आरे से कटना, प्राचीन लोगों का वह विश्वास था कि काशी में आरे से कटने पर मुक्ति मिल जाती है)

सुंदर भजन में मीरा बाई की श्रीकृष्ण (गिरधरनागर) के प्रति अनन्य प्रेम और भक्ति की तीव्र लगन का उद्गार झलकता है, जो भक्त के हृदय को उनके प्रेम और समर्पण के रस में डुबो देता है। यह भाव उस सत्य को प्रकट करता है कि श्रीकृष्ण के प्रति मीरा की लगन इतनी गहरी है कि उनके बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं।

मीरा का यह कहना कि ऐसी लगन लगाकर वह कहाँ जाएँ, उनकी उस बेचैनी और प्रेम की गहराई को दर्शाता है, जो श्रीकृष्ण के दर्शन के बिना अधूरी है। यह उद्गार मन को उस अनुभूति से जोड़ता है, जैसे कोई प्रेमी अपने प्रिय के बिना हर पल तड़पता है। “तुम देखे बिन कलि न परति है” का भाव उनकी उस तलफ को रेखांकित करता है, जिसमें प्राण तड़प-तड़प कर निकलने को व्याकुल हैं।

श्रीकृष्ण के खातिर जोगन बनने और काशी में करवट लेने की बात मीरा के पूर्ण वैराग्य और समर्पण को दर्शाती है। यह भाव उस सत्य को उजागर करता है कि सच्चा भक्त अपने प्रभु के लिए सांसारिक सुखों को त्यागकर मुक्ति की राह चुनता है। जैसे कोई विद्यार्थी अपने गुरु के लिए सर्वस्व अर्पित कर देता है, वैसे ही मीरा का जीवन केवल श्रीकृष्ण के चरणों की दासी बनने के लिए है।

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