हो गुरुवर प्यारे ये भक्त तुम्हारे दादागुरुदेव
हो गुरुवर प्यारे ये भक्त तुम्हारे दादागुरुदेव
हो गुरुवर प्यारे,
ये भक्त तुम्हारे,
आये हैं तेरे द्वारे,
गुरु चरणों की छाँव में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में,
हो खेवनहारे,
ओ गुरुजी हमारे,
हम तेरे ही सहारे,
बैठे हैं तेरी नाव में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में।
मालपुरा की गलियां ओ दादा,
स्वर्ग से सुंदर लगती हैं,
तेरे गाँव में हवाएं भी ओ गुरुवर,
बड़े अदब से चलती हैं,
बड़ा ही अदभुत,
यहाँ का नजारा,
इन नेनो ने निहारा,
ये खूबसूरत,
मेरे दादा की मूरत,
बसी है इन निगाहों में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में।
तेरे द्वार पर,
जो भी है आता,
उनकी बिगड़ी बनती है,
तेरी कृपा से ही मेरे दादा,
भक्तों को खुशियां मिलती हैं,
खुश हो जाये,
जिसपे गुरुवर,
उनकी किस्मत सुपर,
दिलबर भजन बनाये अंजू गाये,
गुरु भक्ति के भाव में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में।
हो गुरुवर प्यारे,
ये भक्त तुम्हारे,
आये हैं तेरे द्वारे,
गुरु चरणों की छाँव में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में,
हो खेवनहारे,
ओ गुरुजी हमारे,
हम तेरे ही सहारे,
बैठे हैं तेरी नाव में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में।
ये भक्त तुम्हारे,
आये हैं तेरे द्वारे,
गुरु चरणों की छाँव में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में,
हो खेवनहारे,
ओ गुरुजी हमारे,
हम तेरे ही सहारे,
बैठे हैं तेरी नाव में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में।
मालपुरा की गलियां ओ दादा,
स्वर्ग से सुंदर लगती हैं,
तेरे गाँव में हवाएं भी ओ गुरुवर,
बड़े अदब से चलती हैं,
बड़ा ही अदभुत,
यहाँ का नजारा,
इन नेनो ने निहारा,
ये खूबसूरत,
मेरे दादा की मूरत,
बसी है इन निगाहों में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में।
तेरे द्वार पर,
जो भी है आता,
उनकी बिगड़ी बनती है,
तेरी कृपा से ही मेरे दादा,
भक्तों को खुशियां मिलती हैं,
खुश हो जाये,
जिसपे गुरुवर,
उनकी किस्मत सुपर,
दिलबर भजन बनाये अंजू गाये,
गुरु भक्ति के भाव में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में।
हो गुरुवर प्यारे,
ये भक्त तुम्हारे,
आये हैं तेरे द्वारे,
गुरु चरणों की छाँव में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में,
हो खेवनहारे,
ओ गुरुजी हमारे,
हम तेरे ही सहारे,
बैठे हैं तेरी नाव में,
आज आये हैं ये,
मालपुरा गाँव में।
बहुत ही प्यारा गुरुदेव भजन Hey Gurudev Pranam हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणों में
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“हे गुरुदेव प्रणाम आपके चरणों में” — यह केवल एक भजन नहीं है, बल्कि शिष्य के हृदय से निकली वह सच्ची पुकार है, जो अपने गुरु के चरणों में पूर्ण समर्पण के साथ झुक जाती है। यह भजन गुरु-शिष्य परंपरा की उसी दिव्यता को प्रकट करता है, जो सनातन संस्कृति की आत्मा रही है।
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Author - Saroj Jangir
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