अब तौ हरी नाम लौ लागी मीरा बाई भजन
अब तौ हरी नाम लौ लागी।
सब जगको यह माखनचोरा नाम धरह्ह्यो बैरागीं।।
कित छोडी वह मोहन मुरली कित छोडी सब गोपी।
मूड मुडा डोरि कटि बांधी माथे मोहन टोपी।।
मात जसोमति माखन-कारन बांधे जाके पांव।
स्यामकिसोर भयो नव गौरा चैतन्य जाको नांव।।
पीतांबर को भाव दिखावै कटि कोपीन कसै।
गौर कृष्ण की दासी मीरा रसना कृष्ण बसै।।
सब जगको यह माखनचोरा नाम धरह्ह्यो बैरागीं।।
कित छोडी वह मोहन मुरली कित छोडी सब गोपी।
मूड मुडा डोरि कटि बांधी माथे मोहन टोपी।।
मात जसोमति माखन-कारन बांधे जाके पांव।
स्यामकिसोर भयो नव गौरा चैतन्य जाको नांव।।
पीतांबर को भाव दिखावै कटि कोपीन कसै।
गौर कृष्ण की दासी मीरा रसना कृष्ण बसै।।
Ab To Hari Naam Lau Lagi - Meera Bhajan
यह मीराबाई का प्रसिद्ध पद (भजन) है, जिसमें वे श्री चैतन्य महाप्रभु की स्तुति करती हैं। इसमें मीराबाई कृष्ण के बाल रूप (माखनचोर) और उनके अवतार स्वरूप चैतन्य महाप्रभु के बीच समानता दिखाती हैं।
यहाँ पद का सरल हिंदी अर्थ (भावार्थ) पंक्ति दर पंक्ति दिया गया है:
अब तौ हरी नाम लौ लागी।
अब तो मुझे हरि (कृष्ण) के नाम की लत लग गई है। (अब हरी-नाम की धुन मेरे मन में जम गई है।)
सब जगको यह माखनचोरा नाम धरह्ह्यो बैरागीं।।
पूरे जगत ने इस माखनचोर (कृष्ण) को ही बैरागी (वैराग्य धारण करने वाला) नाम दे दिया है।
(अर्थात् लोग अब माखन चुराने वाले बाल कृष्ण को ही त्याग-वैराग्य का प्रतीक मान रहे हैं।)
कित छोडी वह मोहन मुरली कित छोडी सब गोपी।
उस मोहन ने कितनी सुंदर मुरली छोड़ दी, कितनी गोपियों को छोड़ दिया।
(अर्थात् कृष्ण ने अपनी मुरली और गोपियों का साथ छोड़कर अब वैराग्य का रूप धारण कर लिया है।)
मूड मुडा डोरि कटि बांधी माथे मोहन टोपी।।
सिर मुंडवा लिया, कमर में डोरी (कौपीन की डोर) बाँध ली, और सिर पर मोहन (छोटी) टोपी पहन ली।
(यह चैतन्य महाप्रभु के सन्यासी रूप का वर्णन है – मुंडित सिर, कौपीन, छोटी टोपी।)
मात जसोमति माखन-कारन बांधे जाके पांव।
माता यशोदा ने जिसके पैर माखन चुराने के कारण बाँध दिए थे।
स्यामकिसोर भयो नव गौरा चैतन्य जाको नांव।।
वही श्यामकिशोर अब नए गोरे रंग वाला हो गया, जिसका नाम चैतन्य है।
(अर्थात् कृष्ण अब चैतन्य महाप्रभु के रूप में गौरवर्ण (गोरा) होकर आए हैं।)
पीतांबर को भाव दिखावै कटि कोपीन कसै।
पीतांबर (पीत वस्त्र) का भाव दिखाने के लिए कमर में कौपीन कस ली है।
(चैतन्य महाप्रभु पीतांबरधारी कृष्ण के भाव को प्रकट करने के लिए सन्यासी वेश में कौपीन पहने हैं।)
गौर कृष्ण की दासी मीरा रसना कृष्ण बसै।।
गौर (गोरे) कृष्ण की दासी मीरा है, मेरी जीभ (रसना) पर कृष्ण ही बसते हैं।
(मीरा कहती हैं – मैं गोरे कृष्ण (चैतन्य) की दासी हूँ, मेरी जीभ पर बस कृष्ण का नाम है।)
भावार्थ
मीराबाई कह रही हैं कि अब तो मुझे हरि-नाम की लत लग गई है। लोग कृष्ण को माखनचोर कहते थे, लेकिन अब वही कृष्ण वैरागी बनकर आए हैं – मुरली-गोपियाँ छोड़कर, सिर मुंडवाकर, कौपीन पहनकर। यशोदा माँ जिस बालक के पैर बाँधती थीं, वही श्याम अब गौरवर्ण चैतन्य के रूप में प्रकट हुए हैं। मीरा खुद को उनके चरणों की दासी मानती हैं और उनकी जीभ पर बस कृष्ण का नाम रहता है।
यहाँ पद का सरल हिंदी अर्थ (भावार्थ) पंक्ति दर पंक्ति दिया गया है:
अब तौ हरी नाम लौ लागी।
अब तो मुझे हरि (कृष्ण) के नाम की लत लग गई है। (अब हरी-नाम की धुन मेरे मन में जम गई है।)
सब जगको यह माखनचोरा नाम धरह्ह्यो बैरागीं।।
पूरे जगत ने इस माखनचोर (कृष्ण) को ही बैरागी (वैराग्य धारण करने वाला) नाम दे दिया है।
(अर्थात् लोग अब माखन चुराने वाले बाल कृष्ण को ही त्याग-वैराग्य का प्रतीक मान रहे हैं।)
कित छोडी वह मोहन मुरली कित छोडी सब गोपी।
उस मोहन ने कितनी सुंदर मुरली छोड़ दी, कितनी गोपियों को छोड़ दिया।
(अर्थात् कृष्ण ने अपनी मुरली और गोपियों का साथ छोड़कर अब वैराग्य का रूप धारण कर लिया है।)
मूड मुडा डोरि कटि बांधी माथे मोहन टोपी।।
सिर मुंडवा लिया, कमर में डोरी (कौपीन की डोर) बाँध ली, और सिर पर मोहन (छोटी) टोपी पहन ली।
(यह चैतन्य महाप्रभु के सन्यासी रूप का वर्णन है – मुंडित सिर, कौपीन, छोटी टोपी।)
मात जसोमति माखन-कारन बांधे जाके पांव।
माता यशोदा ने जिसके पैर माखन चुराने के कारण बाँध दिए थे।
स्यामकिसोर भयो नव गौरा चैतन्य जाको नांव।।
वही श्यामकिशोर अब नए गोरे रंग वाला हो गया, जिसका नाम चैतन्य है।
(अर्थात् कृष्ण अब चैतन्य महाप्रभु के रूप में गौरवर्ण (गोरा) होकर आए हैं।)
पीतांबर को भाव दिखावै कटि कोपीन कसै।
पीतांबर (पीत वस्त्र) का भाव दिखाने के लिए कमर में कौपीन कस ली है।
(चैतन्य महाप्रभु पीतांबरधारी कृष्ण के भाव को प्रकट करने के लिए सन्यासी वेश में कौपीन पहने हैं।)
गौर कृष्ण की दासी मीरा रसना कृष्ण बसै।।
गौर (गोरे) कृष्ण की दासी मीरा है, मेरी जीभ (रसना) पर कृष्ण ही बसते हैं।
(मीरा कहती हैं – मैं गोरे कृष्ण (चैतन्य) की दासी हूँ, मेरी जीभ पर बस कृष्ण का नाम है।)
भावार्थ
मीराबाई कह रही हैं कि अब तो मुझे हरि-नाम की लत लग गई है। लोग कृष्ण को माखनचोर कहते थे, लेकिन अब वही कृष्ण वैरागी बनकर आए हैं – मुरली-गोपियाँ छोड़कर, सिर मुंडवाकर, कौपीन पहनकर। यशोदा माँ जिस बालक के पैर बाँधती थीं, वही श्याम अब गौरवर्ण चैतन्य के रूप में प्रकट हुए हैं। मीरा खुद को उनके चरणों की दासी मानती हैं और उनकी जीभ पर बस कृष्ण का नाम रहता है।
