संतन जात ना पूछो निरगुनियाँ कबीर भजन
संतन जात ना पूछो निरगुनियाँ,
साध ब्राहमन साध छत्तरी, साधै जाती बनियाँ,
साधनमां छत्तीस कौम है, टेढी तोर पुछनियाँ,
साधै नाऊ साधै धोबी, साधै जाति है बरियाँ,
साधनमां रैदास संत है, सुपच ऋषि सों भंगिया,
हिंदू-तुर्क दुई दीन बने हैं, कछू ना पहचानियाँ,
साध ब्राहमन साध छत्तरी, साधै जाती बनियाँ,
साधनमां छत्तीस कौम है, टेढी तोर पुछनियाँ,
साधै नाऊ साधै धोबी, साधै जाति है बरियाँ,
साधनमां रैदास संत है, सुपच ऋषि सों भंगिया,
हिंदू-तुर्क दुई दीन बने हैं, कछू ना पहचानियाँ,
Malini Awasthi | Santan Jaat Na Pucho Nirguniya Santan Jaat Na Poochho Niraguniyaan |
Saadhanamaan Chhattees Kaum Hai, Tedhee Tor Puchhaniyaan |
Saadhai Naoo Saadhai Dhobee, Saadhai Jaati Hai Bariyaan |
Saadhanamaan Raidaas Sant Hai, Supach Rshi Son Bhangiya |
Hindoo-turk Duee Deen Bane Hain, Kachhoo Na Pahachaaniyaan ||
Saadhai Naoo Saadhai Dhobee, Saadhai Jaati Hai Bariyaan |
Saadhanamaan Raidaas Sant Hai, Supach Rshi Son Bhangiya |
Hindoo-turk Duee Deen Bane Hain, Kachhoo Na Pahachaaniyaan ||
संत कबीर दास जी इन पंक्तियों के माध्यम से समाज में व्याप्त जातिवाद और भेदभाव पर कड़ा प्रहार करते हुए कहते हैं कि किसी संत या आध्यात्मिक व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान और भक्ति से होनी चाहिए। वे स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर की भक्ति करने वाला व्यक्ति चाहे वह ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो या वैश्य (बनिया), वह केवल एक 'साधु' है। कबीर के अनुसार, साधु समाज में सभी छत्तीस कौमों के लोग शामिल हो सकते हैं, इसलिए किसी की जाति पूछना व्यर्थ और तर्कहीन है। वे जोर देते हैं कि परमात्मा के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि का कोई महत्व नहीं रह जाता, क्योंकि भक्ति सबको एक ही धरातल पर ले आती है।
आगे कबीर उदाहरण देते हुए कहते हैं कि भक्ति के मार्ग पर नाई, धोबी और बारी जैसी छोटी समझी जाने वाली जातियों के लोग भी सिद्ध हुए हैं। वे संत रैदास और सुपच ऋषि (जो कि वाल्मीकि समाज से संबंधित माने जाते हैं) का विशेष उल्लेख करते हुए बताते हैं कि अपनी जाति के कारण वे ईश्वर से दूर नहीं हुए, बल्कि अपने गुणों से पूजनीय बने। अंत में, वे हिंदू और मुसलमान के भेदभाव को अज्ञानता बताते हुए कहते हैं कि लोगों ने धर्मों के नाम पर तो बंटवारा कर लिया, लेकिन वे उस परम सत्य या ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाए जो इन सभी सांसारिक सीमाओं से परे है।
आगे कबीर उदाहरण देते हुए कहते हैं कि भक्ति के मार्ग पर नाई, धोबी और बारी जैसी छोटी समझी जाने वाली जातियों के लोग भी सिद्ध हुए हैं। वे संत रैदास और सुपच ऋषि (जो कि वाल्मीकि समाज से संबंधित माने जाते हैं) का विशेष उल्लेख करते हुए बताते हैं कि अपनी जाति के कारण वे ईश्वर से दूर नहीं हुए, बल्कि अपने गुणों से पूजनीय बने। अंत में, वे हिंदू और मुसलमान के भेदभाव को अज्ञानता बताते हुए कहते हैं कि लोगों ने धर्मों के नाम पर तो बंटवारा कर लिया, लेकिन वे उस परम सत्य या ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाए जो इन सभी सांसारिक सीमाओं से परे है।
Malini Awasthi talks about how Kabir was ahead of his times, by reciting his couplets which question diktats laid by religion. #MahindraKabiraFestival
