चेत रे नर चेतरे थारो चिड़िया चुग गयी खेत भजन
चेत रे नर चेतरे थारो चिड़िया चुग गयी खेत भजन
(ए जी ) आछे दिन पाछे गए
गुरु से किया नहीं हेत (प्रेम-लगाव)
(अरे ) अब पछतावे क्या करें
जब चिड़िया चुग गयी खेत
चंचल मनवा चेत रे
ने सोवे कहे अनजान
जम घर जब ले जायेगा
तो पड़ा रहेगा न्यान
(एजी ) भक्ति बीज है प्रेम का
न प्रकट प्रथ्वी माय
कहे कबीर धोया घणा
और निपजे कोई एक नाय
अरे चेत रे नर चेत रे
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे
नर नुगरा रे................ (नुगरा-अहसान ना मानने वाला, जीव को मानव जीवन मिला लेकिन उसने हरी का सुमिरण ना करके अहसान फ़रामोशी की )
एजी अब तो मन में चेत रे
तू अब तो दिल में चेत रे
एजी चेत रे नर चेत रे
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
थारे गुरु के नाम से आंटी
(मनमुटाव - दूरी ) रे
अब कुण चढ़ावे थारी घाटी रे
नर नुगरा रे
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
गुरु के नाम से आंटी रे
अब कुण चढ़ावे थारी घाटी रे
नर नुगरा रे
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
एजी चेत रे नर चेत रे
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
एजी चेत रे नर चेत रे
थारे गुरूजी बतावेगा भेद रे
ज्यासे कटे करम की रेख रे
नर नुगरा रे................
अरे अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
हे गुरूजी बतावे भेद रे
ज्यांसे छूटे जनम की कैद रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
अरे चेत रे नर चेत रे
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे
नर नुगरा रे................
अरे अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
थोड़ो समझ देख ले आखिर रे,
अब ढाढर खहिज्यो आखिर रे,
नर नुगरा रे................
अरे अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
थोड़ो समझ देख ले आखिर रे,
अब ढाढर खहिज्यो आखिर रे,
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
गुरु चरण दास की वाणी रे
जिन सार शब्द पहचानी रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
गुरु चरण दास की वाणी रे
जिन सार शब्द पहचानी रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
अरे चेत रे नर चेत रे
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
गुरु से किया नहीं हेत (प्रेम-लगाव)
(अरे ) अब पछतावे क्या करें
जब चिड़िया चुग गयी खेत
चंचल मनवा चेत रे
ने सोवे कहे अनजान
जम घर जब ले जायेगा
तो पड़ा रहेगा न्यान
(एजी ) भक्ति बीज है प्रेम का
न प्रकट प्रथ्वी माय
कहे कबीर धोया घणा
और निपजे कोई एक नाय
अरे चेत रे नर चेत रे
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे
नर नुगरा रे................ (नुगरा-अहसान ना मानने वाला, जीव को मानव जीवन मिला लेकिन उसने हरी का सुमिरण ना करके अहसान फ़रामोशी की )
एजी अब तो मन में चेत रे
तू अब तो दिल में चेत रे
एजी चेत रे नर चेत रे
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
थारे गुरु के नाम से आंटी
(मनमुटाव - दूरी ) रे
अब कुण चढ़ावे थारी घाटी रे
नर नुगरा रे
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
गुरु के नाम से आंटी रे
अब कुण चढ़ावे थारी घाटी रे
नर नुगरा रे
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
एजी चेत रे नर चेत रे
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
एजी चेत रे नर चेत रे
थारे गुरूजी बतावेगा भेद रे
ज्यासे कटे करम की रेख रे
नर नुगरा रे................
अरे अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
हे गुरूजी बतावे भेद रे
ज्यांसे छूटे जनम की कैद रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
अरे चेत रे नर चेत रे
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे
नर नुगरा रे................
अरे अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
थोड़ो समझ देख ले आखिर रे,
अब ढाढर खहिज्यो आखिर रे,
नर नुगरा रे................
अरे अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
थोड़ो समझ देख ले आखिर रे,
अब ढाढर खहिज्यो आखिर रे,
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
गुरु चरण दास की वाणी रे
जिन सार शब्द पहचानी रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
गुरु चरण दास की वाणी रे
जिन सार शब्द पहचानी रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
अरे चेत रे नर चेत रे
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे
नर नुगरा रे................
एजी अब तो मन में चेत रे
हाँ अब तो दिल में चेत रे
चेत रे नर चेत रे - Chet Re Nar Chet Re Tharo Chidiya Chug Gayi Khet Re, | Prahlad Singh Tipaniya
जागो जुगा का भाई जागो जुगा रा जिवडा रे : तुम युगों से अज्ञान की निंद्रा में सो रहे हो, अब जागो मेरे भाई। जिवडा-हृदय जहाँ पर ईश्वर का अंश है।
सुतोडा जागो, सुतोडा जागो रे : तुम सोये हुए हो अब तो जागो।
मन महीला ने मारो रे, जागों जुगा रा : अपने हृदय के अंदर व्याप्त अहम् को मारो, अब तो जागो।
जागो म्हारा हंसा, धणी जगावे : जीवात्मा तुम अब जागो तुम्हे तुम्हारा स्वामी जगा रहा है।
चेत रे नर चेत रे, थारो चिड़िया चुग गई खेत रे, नर नुगरा रे : चेत से आशय है की चेतन अवस्था को प्राप्त करो, ग़ाफ़िल मत रहो। नगर में चारों तरफ चोर हैं जो तुम्हारे सोने के इन्तजार में रहते हैं इसलिए तुम जागो। जीव को नुगरा (अहसान फरामोश) कहा है क्यों की वह जीवन के महत्त्व को समझना नहीं चाहता है। वह माया के ही भरम में पड़ा रहता है। इसलिए हरी के गुणों का गान करो, जीवन का यही उद्देश्य है।
तू अब तो मन में चेत रे : तुम अब अपने हृदय में जाग्रत अवस्था को प्राप्त करो। जागो यह जीवन बीतता जा रहा है।
ए जी आछे दिन पाछे गए : शारीरिक सामर्थ्य के दिन तो बीत गए हैं।
गुरु से किया नहीं हेत (प्रेम-लगाव : तुमने गुरु से लगाव नहीं किया, गुरु की शिक्षाओं पर ध्यान नहीं दिया।
अरे अब पछतावा क्या करें, जब चिड़िया चुग गयी खेत : अब पछताने से कुछ नहीं होने वाला है क्योंकि तुमने अपने समय को व्यर्थ ही गँवा दिया है।
हंसा तूँ तो सबल था, हलकी अपनी चाल, रंग कुरंगी रंगिया, बहुत किया और लगवार : हंसा से आशय शुद्ध हृदय रूपी जीवात्मा से है। वह शुद्ध थी लेकिन खराब संगत में पढ़कर उसने स्वंय को अशुद्धता में रंग लिया है।
थारे गुरु के नाम से आंटी : तेरे हृदय में गुरु के प्रति भेद कैसा है ? (मनमुटाव - दूरी )
अब कुण चढ़ावे थारी घाटी रे : अब तुमको इस घाटी से ऊपर की तरफ कौन लेकर जाए ?
नर नुगरा रै,
थारे गुरूजी बतावेगा भेद रे ज्यासे कटे करम की रेख रे : तुमको / थारे गुरूजी ही ज्ञान का भेद बताएँगे जिससे तुम्हारे कर्मों की रखा कट जायेगी। गुरु ही तुमको इस भव सागर से निकाल सकते हैं।
सुतोडा जागो, सुतोडा जागो रे : तुम सोये हुए हो अब तो जागो।
मन महीला ने मारो रे, जागों जुगा रा : अपने हृदय के अंदर व्याप्त अहम् को मारो, अब तो जागो।
जागो म्हारा हंसा, धणी जगावे : जीवात्मा तुम अब जागो तुम्हे तुम्हारा स्वामी जगा रहा है।
चेत रे नर चेत रे, थारो चिड़िया चुग गई खेत रे, नर नुगरा रे : चेत से आशय है की चेतन अवस्था को प्राप्त करो, ग़ाफ़िल मत रहो। नगर में चारों तरफ चोर हैं जो तुम्हारे सोने के इन्तजार में रहते हैं इसलिए तुम जागो। जीव को नुगरा (अहसान फरामोश) कहा है क्यों की वह जीवन के महत्त्व को समझना नहीं चाहता है। वह माया के ही भरम में पड़ा रहता है। इसलिए हरी के गुणों का गान करो, जीवन का यही उद्देश्य है।
तू अब तो मन में चेत रे : तुम अब अपने हृदय में जाग्रत अवस्था को प्राप्त करो। जागो यह जीवन बीतता जा रहा है।
ए जी आछे दिन पाछे गए : शारीरिक सामर्थ्य के दिन तो बीत गए हैं।
गुरु से किया नहीं हेत (प्रेम-लगाव : तुमने गुरु से लगाव नहीं किया, गुरु की शिक्षाओं पर ध्यान नहीं दिया।
अरे अब पछतावा क्या करें, जब चिड़िया चुग गयी खेत : अब पछताने से कुछ नहीं होने वाला है क्योंकि तुमने अपने समय को व्यर्थ ही गँवा दिया है।
हंसा तूँ तो सबल था, हलकी अपनी चाल, रंग कुरंगी रंगिया, बहुत किया और लगवार : हंसा से आशय शुद्ध हृदय रूपी जीवात्मा से है। वह शुद्ध थी लेकिन खराब संगत में पढ़कर उसने स्वंय को अशुद्धता में रंग लिया है।
थारे गुरु के नाम से आंटी : तेरे हृदय में गुरु के प्रति भेद कैसा है ? (मनमुटाव - दूरी )
अब कुण चढ़ावे थारी घाटी रे : अब तुमको इस घाटी से ऊपर की तरफ कौन लेकर जाए ?
नर नुगरा रै,
थारे गुरूजी बतावेगा भेद रे ज्यासे कटे करम की रेख रे : तुमको / थारे गुरूजी ही ज्ञान का भेद बताएँगे जिससे तुम्हारे कर्मों की रखा कट जायेगी। गुरु ही तुमको इस भव सागर से निकाल सकते हैं।
आछे दिन पाछे गए
गुरु से किया नहीं हेत,
अब पछतावे क्या करें
जब चिड़िया चुग गयी खेत,
( आछे दिन पाछे गये, हरि सो किया ना हेत।
अब पछितावा क्या करै, चिड़िया चुगि गयी खेत।।)
भक्ति बीज है प्रेम का, और ना प्रकटे पृथ्वी माय,
कहैं कबीर बोया घना, और निपजे एक माय,
(भक्ति बीज है प्रेम का, परगट पृथ्वी मांहि ।
कहैं कबीर बोया घणा, और निपजे एक नाहीं)
अरे चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे,
अब तो मन में चेत रे,
तू अब तो दिल में चेत रे,
एजी चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे।
गुरु के नाम से आंटी रे,
अब कुण चढ़ावे थारी घाटी रे,
नर नुगरा रे,
अरे अब तो मूरख जाग रे,
अरे अब तो दिल में चेत रे,
अरे चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे,
नर नुगरा रे,
अब तो मन में चेत रे,
ओ जी अब तो मन में चेत रे।
थारे गुरूजी बतावेगा भेद रे,
थारे कटे करम की रेख रे,
नर नुगरा रे,
अरे अब तो मूरख चेत रे,
अरे अब तो दिल में चेत रे,
अरे चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे,
नर नुगरा रे,
अब तो मन में चेत रे,
ओ जी अब तो मन में चेत रे।
थोड़ो समझ देख ले आखिर रे,
अब गाडर खहि ज्यो आखिर रे,
गाडर -गाडी। यहाँ शरीर को गाडी कहा गया है जिसका नाश तुमने कर दिया है, इसकी उपयोगिता को नहीं समझा।
नर नुगरा रे,
अरे अब तो मूरख चेत रे,
अरे अब तो दिल में चेत रे,
अरे चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे,
नर नुगरा रे,
अब तो मन में चेत रे,
ओ जी अब तो मन में चेत रे।
गुरु चरण दास की वाणी रे
जिन सार शब्द पहचानी रे
नर नुगरा रे,
अरे अब तो मूरख चेत रे,
अरे अब तो दिल में चेत रे,
अरे चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे,
नर नुगरा रे,
अब तो मन में चेत रे,
ओ जी अब तो मन में चेत रे।
चेत रे नर चेत रे थारो चिड़िया भजन मीनिंग
आछे दिन पाछे गए गुरु से किया नहीं हेत, : अच्छे दिन तो गुज़र गए, निकल गए। जब शरीर में सामर्थ्य था वही अच्छे दिन थे। जब यौवन था तो गुरु और गुरु की शिक्षाओं से हेत नहीं किया, प्रेम नहीं किया, ध्यान नहीं दिया। साहेब ने अनेकों स्थान पर कहा है की जब तक शरीर में जान होती है व्यक्ति माया के भ्रम में रहता है और इस जगत को स्थाई रूप से अपना ठिकाना मानने लगता है। वह यह नहीं सोचता है की यह तो सराय है, जाना है एक रोज सभी को, तो वह कैसे बच सकता है। जब वात कफ और पित्त घेर लेते हैं, शरीर रोगों का घर बन जाता है तो उसे ईश्वर याद आता है।
अब पछतावे क्या करें, जब चिड़िया चुग गयी खेत : अब पछताने से क्या फायदा होने वाला है, अच्छा समय तो तुमने बिता दिया। अब चिड़िया खेत को चुग गई है। विषय वासना और माया का भरम ही चिड़िया है और मानव जीवन खेत के समान है। इस खेत को बड़े यतन के उपरान्त पाया लेकिन इसका महत्त्व नहीं समझ पाए और चिड़िया को खेत चुगने दिया।
( आछे दिन पाछे गये, हरि सो किया ना हेत।
अब पछितावा क्या करै, चिड़िया चुगि गयी खेत।।)
भक्ति बीज है प्रेम का, और ना प्रकटे पृथ्वी माय : भक्ति एक तरह से बीज के समान है। यह पृथ्वी में ही अंकुरित होती है।
कहैं कबीर बोया घना, और निपजे एक माय : जैसे बीज अनेकों बोये जाते हैं लेकिन एक आध ही पूर्ण रूप से पल्ल्वित हो पाता है, ऐसे ही भक्ति का पूर्ण रूप से प्राकट्य किसी ख़ास व्यक्ति में हो पाता है जो इसे शिद्द्त से करें।
(भक्ति बीज है प्रेम का, परगट पृथ्वी मांहि ।
कहैं कबीर बोया घणा, और निपजे एक नाहीं )
अरे चेत रे नर चेत रे : चेत-जागो, चिड़िया-माया, नर-जीवात्मा : कबीर साहेब कहते हैं की जीवात्मा तुम जागो और देखो की तुम्हारे खेत में चिड़िया चुग गई है। तुमने अज्ञान के अन्धकार में स्वंय का ही नुकसान कर लिया है। मानव जीवन का उद्देश्य माया को इकठ्ठा करना नहीं अपितु मालिक के नाम का सुमिरण करना है।
गुरु के नाम से आंटी रे, अब कुण चढ़ावे थारी घाटी रे : आंटी -मरोड़ होना, दुरी होना, थारी-तुम्हारी, घाटी-पहाड़। गुरु के नाम से तुम्हारी बनती नहीं है, तुमने गुरु को कभी माना ही नहीं। अब ऐसे में तुमको पहाड़ी पर कौन चढ़ावे, कौन तुमको भक्ति मार्ग के कठिन राह के ऊपर आगे बढ़ाएं ?
नर नुगरा रे : नुगरा-अहसान फ़रामोश। जीवात्मा को नुगरा कहा गया है क्योंकि वह मालिक को ही भूल गई है। वह बागों में आकर भँवरे की भाँती मस्त हो गई है लेकिन वह भूल गई की ये तो दो दिन है फिर ?
थारे गुरूजी बतावेगा भेद रे, थारे कटे करम की रेख रे : गुरु ही तुमको भेद की बातें, रहस्य को बताएँगे जो गूढ़ है, सतही नहीं। इस ज्ञान के कारण तुम्हारे कर्मों की रेखा, कर्मों का परिणाम का जो बंधन है वह कटेगा।
गुरु से किया नहीं हेत,
अब पछतावे क्या करें
जब चिड़िया चुग गयी खेत,
( आछे दिन पाछे गये, हरि सो किया ना हेत।
अब पछितावा क्या करै, चिड़िया चुगि गयी खेत।।)
भक्ति बीज है प्रेम का, और ना प्रकटे पृथ्वी माय,
कहैं कबीर बोया घना, और निपजे एक माय,
(भक्ति बीज है प्रेम का, परगट पृथ्वी मांहि ।
कहैं कबीर बोया घणा, और निपजे एक नाहीं)
अरे चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे,
अब तो मन में चेत रे,
तू अब तो दिल में चेत रे,
एजी चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे।
गुरु के नाम से आंटी रे,
अब कुण चढ़ावे थारी घाटी रे,
नर नुगरा रे,
अरे अब तो मूरख जाग रे,
अरे अब तो दिल में चेत रे,
अरे चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे,
नर नुगरा रे,
अब तो मन में चेत रे,
ओ जी अब तो मन में चेत रे।
थारे गुरूजी बतावेगा भेद रे,
थारे कटे करम की रेख रे,
नर नुगरा रे,
अरे अब तो मूरख चेत रे,
अरे अब तो दिल में चेत रे,
अरे चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे,
नर नुगरा रे,
अब तो मन में चेत रे,
ओ जी अब तो मन में चेत रे।
थोड़ो समझ देख ले आखिर रे,
अब गाडर खहि ज्यो आखिर रे,
गाडर -गाडी। यहाँ शरीर को गाडी कहा गया है जिसका नाश तुमने कर दिया है, इसकी उपयोगिता को नहीं समझा।
नर नुगरा रे,
अरे अब तो मूरख चेत रे,
अरे अब तो दिल में चेत रे,
अरे चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे,
नर नुगरा रे,
अब तो मन में चेत रे,
ओ जी अब तो मन में चेत रे।
गुरु चरण दास की वाणी रे
जिन सार शब्द पहचानी रे
नर नुगरा रे,
अरे अब तो मूरख चेत रे,
अरे अब तो दिल में चेत रे,
अरे चेत रे नर चेत रे,
थारो चिड़िया चुग गयी खेत रे,
नर नुगरा रे,
अब तो मन में चेत रे,
ओ जी अब तो मन में चेत रे।
चेत रे नर चेत रे थारो चिड़िया भजन मीनिंग
आछे दिन पाछे गए गुरु से किया नहीं हेत, : अच्छे दिन तो गुज़र गए, निकल गए। जब शरीर में सामर्थ्य था वही अच्छे दिन थे। जब यौवन था तो गुरु और गुरु की शिक्षाओं से हेत नहीं किया, प्रेम नहीं किया, ध्यान नहीं दिया। साहेब ने अनेकों स्थान पर कहा है की जब तक शरीर में जान होती है व्यक्ति माया के भ्रम में रहता है और इस जगत को स्थाई रूप से अपना ठिकाना मानने लगता है। वह यह नहीं सोचता है की यह तो सराय है, जाना है एक रोज सभी को, तो वह कैसे बच सकता है। जब वात कफ और पित्त घेर लेते हैं, शरीर रोगों का घर बन जाता है तो उसे ईश्वर याद आता है।
अब पछतावे क्या करें, जब चिड़िया चुग गयी खेत : अब पछताने से क्या फायदा होने वाला है, अच्छा समय तो तुमने बिता दिया। अब चिड़िया खेत को चुग गई है। विषय वासना और माया का भरम ही चिड़िया है और मानव जीवन खेत के समान है। इस खेत को बड़े यतन के उपरान्त पाया लेकिन इसका महत्त्व नहीं समझ पाए और चिड़िया को खेत चुगने दिया।
( आछे दिन पाछे गये, हरि सो किया ना हेत।
अब पछितावा क्या करै, चिड़िया चुगि गयी खेत।।)
भक्ति बीज है प्रेम का, और ना प्रकटे पृथ्वी माय : भक्ति एक तरह से बीज के समान है। यह पृथ्वी में ही अंकुरित होती है।
कहैं कबीर बोया घना, और निपजे एक माय : जैसे बीज अनेकों बोये जाते हैं लेकिन एक आध ही पूर्ण रूप से पल्ल्वित हो पाता है, ऐसे ही भक्ति का पूर्ण रूप से प्राकट्य किसी ख़ास व्यक्ति में हो पाता है जो इसे शिद्द्त से करें।
(भक्ति बीज है प्रेम का, परगट पृथ्वी मांहि ।
कहैं कबीर बोया घणा, और निपजे एक नाहीं )
अरे चेत रे नर चेत रे : चेत-जागो, चिड़िया-माया, नर-जीवात्मा : कबीर साहेब कहते हैं की जीवात्मा तुम जागो और देखो की तुम्हारे खेत में चिड़िया चुग गई है। तुमने अज्ञान के अन्धकार में स्वंय का ही नुकसान कर लिया है। मानव जीवन का उद्देश्य माया को इकठ्ठा करना नहीं अपितु मालिक के नाम का सुमिरण करना है।
गुरु के नाम से आंटी रे, अब कुण चढ़ावे थारी घाटी रे : आंटी -मरोड़ होना, दुरी होना, थारी-तुम्हारी, घाटी-पहाड़। गुरु के नाम से तुम्हारी बनती नहीं है, तुमने गुरु को कभी माना ही नहीं। अब ऐसे में तुमको पहाड़ी पर कौन चढ़ावे, कौन तुमको भक्ति मार्ग के कठिन राह के ऊपर आगे बढ़ाएं ?
नर नुगरा रे : नुगरा-अहसान फ़रामोश। जीवात्मा को नुगरा कहा गया है क्योंकि वह मालिक को ही भूल गई है। वह बागों में आकर भँवरे की भाँती मस्त हो गई है लेकिन वह भूल गई की ये तो दो दिन है फिर ?
थारे गुरूजी बतावेगा भेद रे, थारे कटे करम की रेख रे : गुरु ही तुमको भेद की बातें, रहस्य को बताएँगे जो गूढ़ है, सतही नहीं। इस ज्ञान के कारण तुम्हारे कर्मों की रेखा, कर्मों का परिणाम का जो बंधन है वह कटेगा।
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Author - Saroj Jangir
मेरे ब्लॉग में आपका स्वागत है, आप यहाँ पर पंजाबी भाषा के शब्द और उनके अर्थ के विषय में जान पायेंगे. इसके अतिरिक्त आप, पंजाबी डिक्शनरी, पंजाबी फोक सोंग, पंजाबी शब्द वाणी, और पंजाबी भजन का अर्थ भी खोज सकते हैं....अधिक पढ़ें। |
