गोविन्द जय जय गोपाल जय जय भजन
गोविन्द जय जय गोपाल जय जय भजन
राधा-रमण हरि, गोविन्द जय-जय॥१॥
ब्रह्माकी जय-जय, विष्णूकी जय-जय।
उमा- पति शिव शंकरकी जय-जय॥२॥
राधाकी जय-जय, रुक्मिणिकी जय-जय।
मोर-मुकुट वंशीवारेकी जय-जय॥३॥
गंगाकी जय-जय, यमुनाकी जय-जय।
सरस्वती, तिरवेणीकी जय-जय॥४॥
रामकी जय-जय श्यामकी जय-जय।
दशरथ-कुँवर चारों भैयों की जय-जय॥५॥
कृष्णाकी जय-जय, लक्ष्मीकी जय-जय।
कृष्ण-बलदेव दोनों भइयोंकी जय-जय॥६॥
Govind Jai Jai Gopal Jai Jai Dhun By Banwari Lal [Full Video Song] I Gobind Jai Jai Gopal Jai Jai
श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों और नामों की महिमा का गान है, जो भक्तों के हृदय में प्रेम, भक्ति और शांति की अनुभूति जगाता है। "गोविन्द जय-जय, गोपाल जय-जय" की उद्घोषणा मात्र से ही उनकी मधुरता और दिव्यता का एहसास होता है। इस भजन में राधा, रुक्मिणी, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गंगा, यमुना जैसे देवताओं और नदियों का उल्लेख करके श्रीकृष्ण की परम समर्थता और व्यापकता का बखान किया गया है। यह भजन दर्शाता है कि श्रीकृष्ण न केवल प्रेम के परम स्वरूप हैं, बल्कि संसार के हर पहलू से जुड़े और उनकी छवि में सभी देवताओं का अंश समाहित है।
श्रीकृष्ण एक ऐसे देवता हैं, जिन्हें संत और दार्शनिक दोनों ही अनंत रूपों और गूढ़ अर्थों में समझते हैं। एक संत की दृष्टि में वे प्रेम के अवतार हैं, जो मन और आत्मा को आनंद और शांति से भर देते हैं। वहीं दर्शनशास्त्र में वे नायक हैं, जो धर्म, न्याय और कर्म की शिक्षा देते हैं। राधा के प्रेम और कृष्ण की लीलाओं से प्रेरित भक्ति मार्ग, जीवन की जटिलताओं को सरल कर देता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। उनकी मुरली की धुन, मोर मुकुट, और वंशीवाली छवि गहरी आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करती है, जो भक्तों को आत्मा की शुद्धि और परम आनंद की ओर ले जाती है। यह भजन स्वयं में भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की एक सुंदर प्रस्तुति है, जो भाव-विभोर कर देता है।
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