कणा कुसुमाग्रज ओळखलत का सर्मला मीनिंग

कणा कुसुमाग्रज ओळखलत का सर्मला

 
कणा - कुसुमाग्रज लिरिक्स kana marathi kavita Lyrics

ओळखलत का सर् मला पावसात आला कोणी
कपडे होते कर्दमलेले केसावरति पाणी

क्षणभर बसला नंतर हसला बोलला वरती पाहुन
गंगामाई पाहुणि आलि गेली घरटयात राहुन

माहेरवाशिण पोरिसारखी चार भिंतित नाचली
मोकळ्या हाती जाईल कशी बायको माञ वाचली

भिंत खचली चूल वीझली होते नव्हते नेले
प्रसाद म्हणुन पापण्यांमधे पाणी माञ ठेवले

कारभारणीला घेऊण संगे सर आता लढतो आहे
पडकी भिंत बान्धतो आहे चिखल गाळ काढतो आहे

खिशाकडे हात जाताच हसत हसत उठला
पैसे नको सर जरा एकटेपणा वाटला


कणा - कुसुमाग्रज । कवी-वि.वा. शिरवाडकर मराठी कविता ।Kana marathi kavita

कवितेत पावसामुळे उद्ध्वस्त झालेल्या घराची परिस्थिती, त्यातून उभारी घेण्याचा निर्धार, आणि मानवी भावना यांचं नाजूक चित्रण केलं आहे. पावसामुळे उद्ध्वस्त झालेलं घर, भिंतींचं खचणं, चूल विझणं, आणि घरातलं काही उरलं नाही हे सर्व दृश्य कवितेत स्पष्ट दिसतं. परंतु, पत्नीच्या वाचण्याचा दिलासा आणि संकटानंतरही मिळालेली जिद्द कवीने सहजपणे मांडली आहे. "प्रसाद म्हणुन पापण्यांमधे पाणी माञ ठेवले" ही ओळ संघर्षाचं आणि भावनिक क्षणाचं उत्कृष्ट दर्शन घडवते. शेवटी, पैसे न घेता फक्त आपलेपणाची भावना शोधणारा हा माणूस मानवी संवेदनशीलतेचं एक जिवंत उदाहरण आहे. ही कविता संकटातून उभारी घेण्याची प्रेरणा देते आणि माणुसकीच्या कडव्या वास्तवाचं दर्शन घडवते.

यह माराठी कविता कुसुमाग्रज द्वारा लिखित “कणा” है। यह एक बहुत ही मार्मिक और गहन कविता है। कविता में एक गरीब, संघर्षरत आदमी बारिश में भीगकर अचानक आता है और पूछता है — “ओळखलत का सर् मला?” (सर, क्या आप मुझे पहचानते हैं?) उसके कपड़े कीचड़ से सने हुए हैं और बालों से पानी टपक रहा है।
क्षण भर बैठने के बाद वह मुस्कुराता है और ऊपर देखकर कहता है कि गंगामाई (बारिश) मेहमान बनकर उसके छोटे से घर में आ गई थी। मायके आई हुई बेटी की तरह वह चार दीवारों के बीच खुशी-खुशी नाची। लेकिन जब वह चली गई, तो खाली हाथ नहीं गई — उसने सब कुछ बहा लिया।
उसकी दीवार गिर गई, चूल्हा बुझ गया, घर की सारी चीजें नष्ट हो गईं। केवल उसकी पत्नी किसी तरह बच गई। बाढ़ ने “प्रसाद” के रूप में केवल उसकी आँखों में आँसू छोड़ दिए।
अब वह अपनी पत्नी (जिसे वह “कारबारिणी” कहता है) के साथ मिलकर लड़ रहा है। वह टूटी हुई दीवार को फिर से बाँध रहा है, कीचड़ और गारे को साफ कर रहा है।
जब सुनने वाला व्यक्ति सहानुभूति में अपनी जेब की ओर हाथ बढ़ाता है तो वह हँसते हुए उठ खड़ा होता है और कहता है — “पैसे नहीं चाहिए सर, बस थोड़ा एकाकीपन महसूस हो रहा था, इसलिए आपसे अपनी बात शेयर कर ली।”

यह कविता गरीबी, प्राकृतिक आपदा (भारी बारिश और बाढ़) और उससे होने वाले विनाश को बहुत सुंदर रूपक के माध्यम से बयान करती है। बारिश को “गंगामाई” और “मायके आई बेटी” के रूप में दिखाया गया है, जो खेल-खेल में सब कुछ नष्ट कर जाती है।
कविता गरीब आदमी की हिम्मत, अपनी पत्नी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दोबारा संघर्ष शुरू करने की भावना, और सबसे महत्वपूर्ण — इंसानी गरिमा को दर्शाती है। वह दान या पैसे नहीं माँगता, सिर्फ किसी से अपना दर्द बाँटना चाहता है। वह अकेलेपन को महसूस कर रहा था, इसलिए किसी को अपनी कहानी सुनाना चाहता था।
कविता में करुणा, संघर्ष, धैर्य और मानवीय संवेदना का अद्भुत मिश्रण है। यह हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी लोगों को पैसे की नहीं, बस सुनने वाले कान और थोड़ी सहानुभूति की जरूरत होती है। 

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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