सुर की गति मैं क्या जानूँ एक भजन करना भजन
सुर की गति मैं क्या जानूँ एक भजन करना भजन
सुर की गति मैं क्या जानूँ
एक भजन करना जानूँ
सुर की गति मैं क्या जानूँ
एक भजन करना जानूँ
अर्थ भजन का भी अति गहरा
उसको भी मैं क्या जानूँ
अर्थ भजन का भी अति गहरा
उसको भी मैं क्या जानूँ
प्रभु प्रभु प्रभु करना जानूँ
प्रभु प्रभु प्रभु करना जानूँ
नैना जल भरना जानूँ
सुर की गति मैं क्या जानूँ
गुण गाये, गुण गाये
प्रभु न्याय न छोड़े
फिर क्यों तुम गुण गाते हो
फिर क्यों तुम गुण गाते हो
मैं बोला मैं प्रेम दीवाना
मैं बोला मैं प्रेम दीवाना
इतनी बातें क्या जानूँ
सुर की गति मैं क्या जानूँ
एक भजन करना जानूँ
सुर की गति मैं क्या जानूँ
एक भजन करना जानूँ
सुर की गति मैं क्या जानूँ
एक भजन करना जानूँ
अर्थ भजन का भी अति गहरा
उसको भी मैं क्या जानूँ
अर्थ भजन का भी अति गहरा
उसको भी मैं क्या जानूँ
प्रभु प्रभु प्रभु करना जानूँ
प्रभु प्रभु प्रभु करना जानूँ
नैना जल भरना जानूँ
सुर की गति मैं क्या जानूँ
गुण गाये, गुण गाये
प्रभु न्याय न छोड़े
फिर क्यों तुम गुण गाते हो
फिर क्यों तुम गुण गाते हो
मैं बोला मैं प्रेम दीवाना
मैं बोला मैं प्रेम दीवाना
इतनी बातें क्या जानूँ
सुर की गति मैं क्या जानूँ
एक भजन करना जानूँ
सुर की गति मैं क्या जानूँ
Sur Ki Gati Main Kya Janoo-Mukesh
जब दिल में सिर्फ एक ही नाम बस जाता है, तो बाकी सब कुछ धीमा पड़ जाता है। सुर की गति क्या, राग-रागिनी की ताल क्या—ये सब छूट जाते हैं। बस एक काम आता है, एक भजन गुनगुनाना, एक नाम पुकारना। भजन का अर्थ कितना गहरा है, वो भी समझ नहीं आता, पर फिर भी रोना आ जाता है, आँखें भर आती हैं, और बस प्रभु-प्रभु-प्रभु कहते रहते हैं। वो पुकार इतनी सच्ची होती है कि शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती, बस आँसू बहते हैं और मन हल्का हो जाता है।
फिर कोई पूछता है—गुण गाते हो, प्रभु तो न्याय करते हैं, फिर क्यों गुण गाते हो? जवाब में बस इतना निकलता है कि मैं प्रेम का दीवाना हूँ। ये प्रेम इतना सरल है, इतना पक्का है कि बाकी सारी बातें, तर्क, बहसें सब फीकी पड़ जाती हैं। मैं तो बस गाता हूँ, क्योंकि गाना ही मेरी भाषा है, पुकार ही मेरी प्रार्थना है। सुर की गति क्या जानूँ, अर्थ क्या समझूँ—बस एक भजन करना जानता हूँ, और वो भजन प्रभु तक पहुँच जाता है। आप सभी पर ईश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री राम जी की।
