जाने वालो ज़रा पूछना श्याम से भजन
जाने वालो ज़रा पूछना श्याम से भजन
क्यों बुलाया नहीं मुझको दरबार में,
क्या ख़ता थी मेरी क्या मेरा दोष था,
क्या कमी रह गई, थी मेरे प्यार में,
जाने वालो ज़रा, पूछना श्याम से,
क्या मिलेगा उसे, दिल मेरा तोड़ कर,
यूँ अकेला मुझे, इस तरह छोड़ कर,
रहता वो जो करता परवाह नहीं,
पर रुळाय मुझे मेरे दिल दार ने,
जाने वालो जरा पूछना श्याम से
जाने वालो ज़रा, पूछना श्याम से,
क्यों बुलाया नहीं मुझको दरबार में,
जाने वालो ज़रा,
उस का अपना हूँ मैं, कोई पराया नहीं,
इक पल भी उसे, तो भुलाया नहीं,
क्या कहूँगा उन्हें मुझसे पूछेंगे जो,
क्यों रुलाया तुझे, तेरे ही यार ने,
जाने वालो ज़रा, पूछना श्याम से,
क्यों बुलाया नहीं मुझको दरबार में,
जाने वालो ज़रा,
क्या मेरा नाम अपनों में शामिल नहीं,
क्या मैं उस के दर्श, के भी काबिल नहीं,
जीना किस के लिए, अपने नजरो से ही,
जो गिराया मुझे, मेरे सरकार ने
जाने वालो ज़रा, पूछना श्याम से,
क्यों बुलाया नहीं मुझको दरबार में,
जाने वालो ज़रा,
सोनू कहता दीवाने क्यों करता फ़िक्र,
फेर सकता नहीं, अपनों से वो नजर,
अपनों से वो नजर,
ये भी मुमकिन है की, एक दिन साँवरा,
चल के आ जाएगा, खुद तेरे द्वार पे,
जाने वालो ज़रा, पूछना श्याम से,
क्यों बुलाया नहीं मुझको दरबार में,
जाने वालो ज़रा,
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भक्त का मन जब श्याम की याद में डूबता है, तब उसकी पुकार में दर्द और प्रेम का एक अनूठा संगम होता है। वह खाटूवाले श्याम से करुण विनती करता है, यह जानने की लालसा लिए कि उसकी क्या गलती थी, क्या कमी थी उसके प्रेम में, कि उसे उनके दरबार का बुलावा नहीं मिला। यह व्यथा उस गहरे समर्पण को दर्शाती है, जो भक्त को श्याम के चरणों से जोड़े रखता है। वह अपने दिल का दुख व्यक्त करता है कि श्याम ने उसे अकेला छोड़कर, उसका दिल तोड़कर क्या पाया। फिर भी, वह यह मानता है कि वह श्याम का अपना है, कोई पराया नहीं, और उसने एक पल भी अपने सांवरिया को नहीं भुलाया। यह भक्ति का वह भाव है, जो भक्त को श्याम की कृपा की आस में हर पल तड़पाता है, पर साथ ही उसे विश्वास भी देता है कि श्याम कभी अपने भक्त को भूलते नहीं।
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