आवो हमारा देस प्रहलाद सिंह टिपानिया भजन

आवो हमारा देस प्रहलाद सिंह टिपानिया भजन

 
आवो हमारा देस Aao Hamare Des Lyrics Kabir Bhajan Prahlad Singh Tipaniya

हम वासी वा देस के, गगन धरण गगन दुइ नांहि।
शब्द मिलावा हो रहा, देह मिलावा नाहीं,
बिन पावन का पंत, और बिन बस्ती का देश,
बिना पिंड का पुरुष है, कहें कबीर सन्देश,
चालो हमारा देस,
बताई द्या थाने प्रेम नगरी,
संतों चालो रे गुरा सा रे देश,
बताई दा थारे भाव नगरी,
भाव नगरी, हो हेली प्रेम नगरी,
संतों आवो हमारा देश,
बताईद्या थारे भाव नगरी,

हेली म्हारी काँच कलियाँ,
कचनार,
कारीगर काया अजब बनी,
अजब बनी काया अजब बणी,
संतों आवो म्हारे देश,
बताई दा थारे भाव नगरी,

हेली म्हारी अलजी पतिया रो रंग,
हो जाय ली काळ की घड़ी,
हो काळ की घड़ी
संतों आवो हमारा देश,
बताई दा थारे भाव नगरी,

हेली म्हारी मत करजे काया को अभिमान,
काया तो थारी चाम से बणी,
हेली म्हारी मत करजे काया को अभिमान,
काया तो थारी चाम से बणी,
चाम से बणी, यामें ऐब घणी,
संतों आवो हमारा देश,
बताई दा थारे भाव नगरी,
भाव नगरी, हो हेली प्रेम नगरी,
संतों आवो हमारा देश,
बताई द्या थारे भाव नगरी,
बताई द्या थारे भाव नगरी,

हेली म्हारी गावे ग़ुलाब दास,
भजन से म्हारी काया सुधरी,
हेली म्हारी गावे ग़ुलाब दास,
भजन से म्हारी काया सुधरी,
काया सुधरी, यासे ऐब बिसरी,
संतों आवो हमारा देश,
बताई दा थारे भाव नगरी,
भाव नगरी, हो हेली प्रेम नगरी,
संतों आवो हमारा देश,
बताई द्या थारे भाव नगरी,
बताई द्या थारे भाव नगरी,
बताई द्या थारे साँची नगरी,


चालो हमारा देस ।। Chalo Hamara des ।। Prahlad Singh Tipaniya
Other Version

गागर ऊपर गागरी चोली ऊपर हार
सूली ऊपर सासरो कहे कबीर विचार
पियूजी बिना म्हारो प्राण पड़े म्हारी हेली
जल बिन मछली मरे
पियूजी बिना म्हारो प्राण पड़े म्हारी हेली
जल बिन मछली मरे
कौन मिलावे म्हारा राम से म्हारी हेली
रोई रोई रुदन करां
म्हारी हेली वो
आवो हमारा देस
अबे म्हाने लाग्यो भजन वालो बाण
म्हारी हेली वो
आवो साहिब जी रा देस
केतो सूती रंग महल में म्हारी हेली
जाग्या रे जतन कराए
केतो सूती रंग महल में म्हारी हेली
जाग्या रे जतन कराए
कौन मिलावे म्हारा राम से म्हारी हेली
रंग भर सेज बिछावो
म्हारी हेली वो
आवो हमारा देस

अबे म्हाने लाग्यो भजन वालो बाण
म्हारी हेली वो
चालो साहिब जी रा देस
छोड़ी दो पीहर सासरो म्हारी हेली
छोड़ी दो रंग भर सेज
छोड़ी दो पीहर सासरो म्हारी हेली
छोड़ी दो रंग भर सेज
छोड़ो पितांबर ओढ़नो म्हारी हेली
धरी लीजो भगवो भेश
म्हारी हेली वो
आवो हमारा देस

अबे म्हाने लाग्यो भजन वालो बाण
म्हारी हेली वो
चालो साहिब जी रा देस
एक भाण की वां क्या पड़ी म्हारी हेली
करोड़ भाण को परकाश
एक भाण की वां क्या पड़ी म्हारी हेली
करोड़ भाण को परकाश
साहिब कबीर धर्मी बोल्या म्हारी हेली
वो तो सूलीरे वालो देस
म्हारी हेली वो
आवो हमारा देस

आबे म्हाने लाग्यो भजन वालो बाण
म्हारी हेली वो
चालो साहिब जी रा देस
म्हारी हेली वो
चालो पीयूजी रा देस
म्हारी हेली वो
आवो हमारा देस 

यह भजन संत कबीर दास जी की परंपरा में बहुत प्रसिद्ध है, इसमें "भाव नगरी" या "प्रेम नगरी" का वर्णन है, जो आत्मिक/आध्यात्मिक जगत को दर्शाता है। कबीर जी कहते हैं कि असली देश/नगरी वह है जहाँ शरीर, जाति-पाति, धरती-आकाश जैसी भौतिक चीजें नहीं हैं, बल्कि शुद्ध प्रेम, भावना और शब्द (सत्य नाम या दिव्य ध्वनि) का मिलन होता है।
यह भजन संतों को बुलाता है कि इस "भाव नगरी" (प्रेम की नगरी) में आओ, जहाँ सच्चा सुख और मुक्ति है। इसमें शरीर की नश्वरता, अभिमान छोड़ने और भजन से काया (मन-शरीर) सुधारने की बात है। 

हम वासी वा देस के, गगन धरण गगन दुइ नांहि।शब्द मिलावा हो रहा, देह मिलावा नाहीं।अर्थ: हम उस देश के वासी हैं जहाँ न धरती है, न आकाश है (दोनों नहीं हैं)। वहाँ शरीरों का मिलन नहीं होता, बल्कि शब्द (दिव्य नाम या सत्य ध्वनि) का मिलन होता है। (यानी असली घर वह आध्यात्मिक लोक है जहाँ आत्माएँ शब्द से जुड़ती हैं, शरीर से नहीं।)
बिन पावन का पंत, और बिन बस्ती का देश,बिना पिंड का पुरुष है, कहें कबीर सन्देश।अर्थ: बिना हवा के रास्ता है, बिना बस्ती का देश है। बिना शरीर वाला पुरुष (परमात्मा या आत्मा) है – कबीर यही संदेश देते हैं। (यहाँ कोई भौतिक नियम नहीं, सब शुद्ध चेतना है।)
चालो हमारा देस, बताई द्या थाने प्रेम नगरी,संतों चालो रे गुरा सा रे देश,बताई दा थारे भाव नगरी।अर्थ: चलो हमारे देश, मैं तुम्हें प्रेम नगरी बताता हूँ। हे संतों, चलो गुरु के देश में। मैं तुम्हें भाव नगरी (भावना/प्रेम की नगरी) बताता हूँ।
(बार-बार संतों को बुलाया जा रहा है कि इस प्रेम की नगरी में आओ।)
हेली म्हारी काँच कलियाँ, कचनार,कारीगर काया अजब बनी, अजब बनी काया अजब बणी।अर्थ: हे सखी, मेरी काँच जैसी कोमल कलियाँ (शरीर या मन की नाजुकता), कचनार (फूल जैसी सुंदरता)। कारीगर (ईश्वर) ने काया (शरीर) बहुत अजब (अद्भुत) बनाई है।
(शरीर की सुंदरता और नाजुकता बताई जा रही है, लेकिन यह नश्वर है।)
हेली म्हारी अलजी पतिया रो रंग,हो जाय ली काळ की घड़ी, हो काळ की घड़ी।अर्थ: हे सखी, मेरी आँखों में रंग (युवावस्था का रंग) अब काल (मृत्यु) की घड़ी हो गई। समय बीत गया, मौत की घड़ी आ गई।
(शरीर का रंग-रूप क्षणभंगुर है, मौत आती है।)
हेली म्हारी मत करजे काया को अभिमान,काया तो थारी चाम से बणी, यामें ऐब घणी।अर्थ: हे सखी, शरीर पर अभिमान मत करो। यह शरीर तो चमड़े (त्वचा) से बना है, इसमें बहुत दोष/ऐब हैं।
(शरीर नश्वर और दोषपूर्ण है, घमंड मत करो।)
हेली म्हारी गावे ग़ुलाब दास,भजन से म्हारी काया सुधरी,काया सुधरी, यासे ऐब बिसरी।अर्थ: गुलाब दास गाता है – भजन से हमारी काया (शरीर/मन) सुधर गई, दोष भूल गए।
(भजन-कीर्तन से मन शुद्ध होता है, दोष मिटते हैं।)
भाव नगरी, हो हेली प्रेम नगरी,संतों आवो हमारा देश,बताई द्या थारे साँची नगरी।अर्थ: भाव नगरी है, हे सखी प्रेम नगरी है। संतों आओ हमारे देश में। मैं तुम्हें सच्ची नगरी बताता हूँ।
(अंत में फिर बुलावा – प्रेम और भाव की सच्ची नगरी में आओ।)

कबीर जी कहते हैं – हमारा असली देश/घर यह संसार नहीं, बल्कि प्रेम नगरी या भाव नगरी है। जहाँ कोई शरीर, धरती-आकाश, जाति-पाति नहीं। वहाँ सिर्फ़ प्रेम, शब्द और आत्मा का मिलन है। शरीर तो चमड़े से बना नश्वर है, इसमें अभिमान मत करो, मौत आ जाएगी। भजन-कीर्तन से मन सुधरो, दोष मिटाओ और संतों! इस प्रेम की सच्ची नगरी में आओ – यहीं मुक्ति और सच्चा सुख है।
 
Vocal and Tambur : Padmshri Prahlad Singh Tipanya
Vocal : Shanti Devi Tipaniya
Video and audio editing : Mayank Tipaniya
 
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