राम नाम की ज्योत जला मन का अँधेरा दूर भजन
राम नाम की ज्योत जला मन का अँधेरा दूर भजन
राम नाम की ज्योत जला,
मन का अँधेरा दूर भगा
राम नाम की ज्योत जला
मेरी हर साँस में राम बसा ।।
भटका जग में दर-दर मैं,
सुख का कोई ठौर न मिला
नाम लिया जब राम का
भीतर ही उजियारा मिला ।।
अब तो मन पुकारे बस, राम तेरा ही नाम सदा,
जब अंतर में दीप जला, मिट जाए मेरी हर व्यथा
माया के सब खेल यहाँ
झूठी सारी ये दुनिया ।।
राम सुमिरन जो कर लिया,
सच्ची हो गई हर दुनिया
जब भी अँधियारा छाए, याद तेरा ही नाम आए
राम की लौ जल उठे, मन में उजियारा हो जाए ।।
राम नाम की ज्योत जला,
राम नाम की ज्योत जला
राम नाम की ज्योत जला ।।
मन का अँधेरा दूर भगा
राम नाम की ज्योत जला
मेरी हर साँस में राम बसा ।।
भटका जग में दर-दर मैं,
सुख का कोई ठौर न मिला
नाम लिया जब राम का
भीतर ही उजियारा मिला ।।
अब तो मन पुकारे बस, राम तेरा ही नाम सदा,
जब अंतर में दीप जला, मिट जाए मेरी हर व्यथा
माया के सब खेल यहाँ
झूठी सारी ये दुनिया ।।
राम सुमिरन जो कर लिया,
सच्ची हो गई हर दुनिया
जब भी अँधियारा छाए, याद तेरा ही नाम आए
राम की लौ जल उठे, मन में उजियारा हो जाए ।।
राम नाम की ज्योत जला,
राम नाम की ज्योत जला
राम नाम की ज्योत जला ।।
राम भजन | जब तक आप यह नहीं सुनेंगे तब तक शांति नहीं मिलेगी
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राम-नाम की ज्योति एक अंदरूनी प्रकाश बनकर अँधेरे मन को चीर देती है। जैसे ही यह प्रकाश जले, भीतर छिपे भय, अनिश्चय और बेचैनी के साये फैलने लगते हैं; वे क्षीण होकर दूर हो जाते हैं। हर साँस में राम का वास होने का अर्थ यह है कि हर पल एक पवित्र चेतना व शांतिपूर्ण स्मृति से भर जाता है—सांस-प्रसांस के साथ जीवन एक आध्यात्मिक लय पा लेता है और साधारण कार्य भी पूजा की तरह हो उठते हैं।
भटकते हुए जीवन की थकन, दर-दर की गुमराहियां और सुख की खोज में लगा अनवसीय कष्ट, नाम-स्मरण की एक निवास-बिंदु में बदल जाते हैं। जब राम का अनाम मात्र भी रूप से स्मरण होता है, भीतर के कोनों में रोशनी फैलती है; अवज्ञा और भ्रम की दीवारें टूटती हैं और एक अंतर्मुखी सुकून का अनुभव होता है जो बाहरी परिस्थितियों से स्वतंत्र है। अस्तित्व का यह उजियारा केवल क्षणिक राहत नहीं; यह स्थायी विश्वास और आशा की नींव रखता है।
मन की पुकार अब केवल किसी सामान्य आशा की पुकार नहीं रहती, बल्कि एक दृढ़ उन्मुखीकरण बन जाती है — सारी इच्छाएँ और भय प्राथमिकता खो देते हैं और एक ही केंद्र के पास आते हैं: राम का नाम। जब अंतरात्मा में दीप जला दिया जाता है, तो जीवन की छोटी-बड़ी पीड़ाएँ और व्यथाएँ कमज़ोर पड़ जाती हैं; उनका प्रभाव घटने लगता है और अंततः शांत हो जाता है। माया के छल और सांसारिक मोह का भ्रामक आकर्षण उजागर होकर नष्ट हो जाता है; दुनिया के भव्य दिखावे और छल-परदे का असली स्वरूप स्पष्ट हो जाता है — वह क्षणिक, झूठा और अस्थायी है।
भटकते हुए जीवन की थकन, दर-दर की गुमराहियां और सुख की खोज में लगा अनवसीय कष्ट, नाम-स्मरण की एक निवास-बिंदु में बदल जाते हैं। जब राम का अनाम मात्र भी रूप से स्मरण होता है, भीतर के कोनों में रोशनी फैलती है; अवज्ञा और भ्रम की दीवारें टूटती हैं और एक अंतर्मुखी सुकून का अनुभव होता है जो बाहरी परिस्थितियों से स्वतंत्र है। अस्तित्व का यह उजियारा केवल क्षणिक राहत नहीं; यह स्थायी विश्वास और आशा की नींव रखता है।
मन की पुकार अब केवल किसी सामान्य आशा की पुकार नहीं रहती, बल्कि एक दृढ़ उन्मुखीकरण बन जाती है — सारी इच्छाएँ और भय प्राथमिकता खो देते हैं और एक ही केंद्र के पास आते हैं: राम का नाम। जब अंतरात्मा में दीप जला दिया जाता है, तो जीवन की छोटी-बड़ी पीड़ाएँ और व्यथाएँ कमज़ोर पड़ जाती हैं; उनका प्रभाव घटने लगता है और अंततः शांत हो जाता है। माया के छल और सांसारिक मोह का भ्रामक आकर्षण उजागर होकर नष्ट हो जाता है; दुनिया के भव्य दिखावे और छल-परदे का असली स्वरूप स्पष्ट हो जाता है — वह क्षणिक, झूठा और अस्थायी है।
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Author - Saroj Jangir
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