कामी थैं कुतो भलौ खोलें एक जू काछ मीनिंग
कामी थैं कुतो भलौ खोलें एक जू काछ मीनिंग
कामी थैं कुतो भलौ, खोलें एक जू काछ।
राम नाम जाणै नहीं, बाँबी जेही बाच॥
राम नाम जाणै नहीं, बाँबी जेही बाच॥
Kami The Kutto Bhalo, Khole Ek Ju Kach,
Ram Naam Jaane Nahi Banbi Jech Bach.
कामी थैं कुतो भलौ : कामी से तो कुत्ता ही ठीक है.
खोलें एक जू काछ : जांघ के निचे का हिस्सा.
राम नाम जाणै नहीं : राम नाम को जानता नहीं है.
बाँबी : सांप का बिल
जेही : जिस तरह का.
बाच :बचना.
खोलें एक जू काछ : जांघ के निचे का हिस्सा.
राम नाम जाणै नहीं : राम नाम को जानता नहीं है.
बाँबी : सांप का बिल
जेही : जिस तरह का.
बाच :बचना.
कबीर साहेब की वाणी है की कामी पुरुष से भला तो कुता ही होता है. वह अपने अमूल्य जीवन को माया और विषय विकारों में समाप्त कर देता है.
कबीर साहेब इस दोहे में बड़े तीखे और साफ़ शब्दों में कामी पुरुष की निंदा करते हैं। उनका कहना है कि एक लंपट, कामुक व्यक्ति से तो कुत्ता भी बेहतर होता है।
कुत्ता तो केवल अपनी भूख और काम-वासना के समय ही व्याकुल होता है, लेकिन जब उसकी इच्छा पूरी हो जाती है, तो वह शांत हो जाता है। परंतु कामी मनुष्य की वासना कभी शांत नहीं होती। वह दिन-रात, हर समय, हर अवस्था में काम-विकारों में फँसा रहता है। उसकी आत्मा निरंतर विषय-सुख की आग में जलती रहती है।
"खोलें एक जू काछ" का अर्थ है — जाँघ के नीचे का कपड़ा (लंगोट या धोती का वह हिस्सा) खोलकर रखना। कबीर कहते हैं कि कामी पुरुष हमेशा अपनी जाँघों के बीच की ओर ध्यान केंद्रित किए रहता है। उसकी पूरी चेतना, उसकी सारी ऊर्जा, उसकी नज़र और विचार उसी एक जगह पर टिके रहते हैं। वह कभी ऊपर नहीं उठ पाता।
फिर कबीर बड़े करुण भाव से कहते हैं — "राम नाम जाणै नहीं, बाँबी जेही बाच"। अर्थात् वह राम नाम का जाप भी नहीं जानता, न ही भगवान का स्मरण करता है। जिस प्रकार साँप अपने बिल (बाँबी) में घुसकर बच जाता है, उसी प्रकार यह कामी पुरुष भी अपनी काम-वासना के बिल में घुसा रहता है और अपने अमूल्य मानव-जन्म को व्यर्थ गँवा देता है।
कबीर साहेब का यह दोहा अत्यंत कठोर है, लेकिन इसमें गहरी करुणा भी है। वे मनुष्य को चेताते हैं कि यदि तुम काम-विकारों में फँसे रहे, तो तुम कुत्ते से भी नीचे गिर जाओगे। कुत्ता तो पशु है, उसका जन्म ही ऐसा है, लेकिन तुम मनुष्य हो। तुम्हें तो राम नाम लेना चाहिए, आत्मा को ऊँचा उठाना चाहिए।
जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों का गुलाम बन जाता है, वह न तो इस लोक में सुख पाता है और न परलोक में मुक्ति। उसका जीवन एक खोखली बाँबी की तरह अंधकारपूर्ण और व्यर्थ हो जाता है।
इसलिए कबीर कहते हैं — हे मनुष्य! काम से बचो, वासना को जीतो, राम नाम को अपनाओ। वरना कुत्ता भी तुमसे कहीं बेहतर है, क्योंकि वह कम से कम अपनी मर्यादा में रहता है, जबकि तुम अपनी मर्यादा भी खो बैठते हो।
यह दोहा काम-नियंत्रण, ब्रह्मचर्य और नाम-स्मरण की महत्ता सिखाता है। कबीर साहेब बार-बार यही चेतावनी देते हैं कि विषय-वासना मनुष्य को सबसे नीचे गिरा देती है, जबकि राम नाम उसे सबसे ऊँचे आसन पर बिठा देता है।
कुत्ता तो केवल अपनी भूख और काम-वासना के समय ही व्याकुल होता है, लेकिन जब उसकी इच्छा पूरी हो जाती है, तो वह शांत हो जाता है। परंतु कामी मनुष्य की वासना कभी शांत नहीं होती। वह दिन-रात, हर समय, हर अवस्था में काम-विकारों में फँसा रहता है। उसकी आत्मा निरंतर विषय-सुख की आग में जलती रहती है।
"खोलें एक जू काछ" का अर्थ है — जाँघ के नीचे का कपड़ा (लंगोट या धोती का वह हिस्सा) खोलकर रखना। कबीर कहते हैं कि कामी पुरुष हमेशा अपनी जाँघों के बीच की ओर ध्यान केंद्रित किए रहता है। उसकी पूरी चेतना, उसकी सारी ऊर्जा, उसकी नज़र और विचार उसी एक जगह पर टिके रहते हैं। वह कभी ऊपर नहीं उठ पाता।
फिर कबीर बड़े करुण भाव से कहते हैं — "राम नाम जाणै नहीं, बाँबी जेही बाच"। अर्थात् वह राम नाम का जाप भी नहीं जानता, न ही भगवान का स्मरण करता है। जिस प्रकार साँप अपने बिल (बाँबी) में घुसकर बच जाता है, उसी प्रकार यह कामी पुरुष भी अपनी काम-वासना के बिल में घुसा रहता है और अपने अमूल्य मानव-जन्म को व्यर्थ गँवा देता है।
कबीर साहेब का यह दोहा अत्यंत कठोर है, लेकिन इसमें गहरी करुणा भी है। वे मनुष्य को चेताते हैं कि यदि तुम काम-विकारों में फँसे रहे, तो तुम कुत्ते से भी नीचे गिर जाओगे। कुत्ता तो पशु है, उसका जन्म ही ऐसा है, लेकिन तुम मनुष्य हो। तुम्हें तो राम नाम लेना चाहिए, आत्मा को ऊँचा उठाना चाहिए।
जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों का गुलाम बन जाता है, वह न तो इस लोक में सुख पाता है और न परलोक में मुक्ति। उसका जीवन एक खोखली बाँबी की तरह अंधकारपूर्ण और व्यर्थ हो जाता है।
इसलिए कबीर कहते हैं — हे मनुष्य! काम से बचो, वासना को जीतो, राम नाम को अपनाओ। वरना कुत्ता भी तुमसे कहीं बेहतर है, क्योंकि वह कम से कम अपनी मर्यादा में रहता है, जबकि तुम अपनी मर्यादा भी खो बैठते हो।
यह दोहा काम-नियंत्रण, ब्रह्मचर्य और नाम-स्मरण की महत्ता सिखाता है। कबीर साहेब बार-बार यही चेतावनी देते हैं कि विषय-वासना मनुष्य को सबसे नीचे गिरा देती है, जबकि राम नाम उसे सबसे ऊँचे आसन पर बिठा देता है।
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Author - Saroj Jangir
दैनिक रोचक विषयों पर में 20 वर्षों के अनुभव के साथ, मैं कबीर के दोहों को अर्थ सहित, कबीर भजन, आदि को सांझा करती हूँ, मेरे इस ब्लॉग पर। मेरे लेखों का उद्देश्य सामान्य जानकारियों को पाठकों तक पहुंचाना है। मैंने अपने करियर में कई विषयों पर गहन शोध और लेखन किया है, जिनमें जीवन शैली और सकारात्मक सोच के साथ वास्तु भी शामिल है....अधिक पढ़ें। |
