सुसरै जी से अरज करूं थी
सुसरै जी से अरज करूं थी
सुसरै जी से अरज करूं थी,
मन्नै हरी-हरी दाख मंगाद्यो जी।
बहू इस रुत में दाख नहीं सै,
मेवा-मिसरी खाल्यो जी।।
बालम जी से अरज करूं थी,
मन्नै हरी-हरी दाख मंगाद्यो जी।
ओ गए पंसारी की दुकान पै,
ल्याए हरी-हरी दाख तुला कै।।
खा कै सोई पीलंग पै,
बालम तै कर री बात बड़े प्यार तै।
जो गोरी थम छोरी जणोगी,
बुरी बात करोगी हम तै।।
जो गोरी थम पुत जणोगी,
दाख मंगा द्यूं और कहीं तै।।
मन्नै हरी-हरी दाख मंगाद्यो जी।
बहू इस रुत में दाख नहीं सै,
मेवा-मिसरी खाल्यो जी।।
बालम जी से अरज करूं थी,
मन्नै हरी-हरी दाख मंगाद्यो जी।
ओ गए पंसारी की दुकान पै,
ल्याए हरी-हरी दाख तुला कै।।
खा कै सोई पीलंग पै,
बालम तै कर री बात बड़े प्यार तै।
जो गोरी थम छोरी जणोगी,
बुरी बात करोगी हम तै।।
जो गोरी थम पुत जणोगी,
दाख मंगा द्यूं और कहीं तै।।
चेतावनी भजन संख्या 722 धणी का राज में घना सुख पाया बेटा का राज में दुखड़ा हो राम।
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Admin - Saroj Jangir
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