सिया खड़ी पछताय कुस बन में हुए

सिया खड़ी पछताय कुस बन में हुए

सिया खड़ी पछताय, कुस बन में हुए,
जो यहाँ होती ललना की दाई।
ललना देती जमाय, सूरज देती पजाय,
मुन्ना लेती खिलाय, कुस बन में हुए।।

जो यहाँ होती ललना की नायन,
मंगल देती गवाय, चौक देती पुराय,
न्हान देती नहलाय, कुस बन में हुए।।

जो यहाँ होती ललना की दादी,
चरुए देती धराय, खुशियां लेती मनाय,
बाजे देती बजवाय, कुस बन में हुए।।

जो यहाँ होती ललना की चाची,
पलंगा देती बिछाय, दीपक देती जलाय,
घुट्टी देती बनाय, कुस बन में हुए।।

जो यहाँ होती ललना की ताई,
ललना लेती खिलाय, मोहरें देती लुटाय,
नेग देती दिलाय, कुस बन में हुए।।

जो यहाँ होती ललना की बुआ,
सतिये देती धराय, काजल देती लगाय,
दूध देती पिलवाय, कुस बन में हुए।।




सोहर : सीता खड़ी पछतायं लव कुश बन में हुए हैं || Sohar : Sita khadi pachatayein

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हर स्त्री की इच्छा होती है कि उसके बच्चे अपने परिवार के बीच में पले बढ़े | सीता को यह सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ , उनके दोनों बच्चे बन में हुए हैं इस बात का सीता जी को बड़ा अफसोस है | इस सोहर में इसी बात को दर्शाया गया है | || सीता खड़ी पछतायं लव कुश बन में हुए हैं ||
 
Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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