ज्योति बिंदु परमात्मा से ऐ मेरी आत्मा भजन
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन,
परमानंद का अनुभव कर,
ओ....परमानंद का अनुभव कर,
तू धन्य बना जीवन,
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन।
प्रभु की प्राप्ति का,
मूल मन्त्र है,
अब चल, कर ले मिलन,
परमानंद का अनुभव कर,
ओ....परमानंद का अनुभव कर,
तू धन्य बना जीवन,
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन।
प्रभु की प्राप्ति का,
मूल मन्त्र है,
सम्पूर्ण समर्पण,
ऐ आत्मा चल,
प्रभु को सौंप दे,
तू सारा जीवन,
देख प्रभु तेरे निकट विराजै,
कर ले अभिवादन,
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन।
ज्योति बिंदु के,
प्रेम सिंधु में,
चल आज नहा ले,
परम पिता का,
प्रेम पात्र बन कर,
तू शुभ वर पा ले,
किरण किरण को,
निरख नयन से,
हो जा मन में मगन,
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन।
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन,
परमानंद का अनुभव कर,
ओ....परमानंद का अनुभव कर,
तू धन्य बना जीवन,
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन।
ऐ आत्मा चल,
प्रभु को सौंप दे,
तू सारा जीवन,
देख प्रभु तेरे निकट विराजै,
कर ले अभिवादन,
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन।
ज्योति बिंदु के,
प्रेम सिंधु में,
चल आज नहा ले,
परम पिता का,
प्रेम पात्र बन कर,
तू शुभ वर पा ले,
किरण किरण को,
निरख नयन से,
हो जा मन में मगन,
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन।
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन,
परमानंद का अनुभव कर,
ओ....परमानंद का अनुभव कर,
तू धन्य बना जीवन,
ज्योति बिंदु परमात्मा से,
ऐ मेरी आत्मा,
अब चल, कर ले मिलन।
ओम शान्ति !
आपके हृदय में ही प्रकाश है, उसका स्वरुप कैसा है ? कहाँ है ? किधर है ? इनका उत्तर आपको कोई भी नहीं दे सकता है ! यह एक खोज है जो व्यक्ति को इश्वर के चरणों में सम्पूर्ण समर्पण करके ही की जा सकती है।
ज्योति बिंदु को पहचानने का यह मूल मन्त्र है, इसके अभाव में आप ना जाने कितनी ही बार गुजर जायेंगे और वह ज्योति आपको दिखाई ही नहीं देगी। वह उसी स्थान पर है बरसों से लेकिन मुझे क्यों नहीं दिखाई देती है ?
उत्तर है की मेरे मन में ही तरह तरह के विचार हैं जो उसे पहचानने में बाधक हैं।
सभी शंका को दूर करके इश्वर के प्रति समर्पण ही ज्योति को प्राप्त करने का एक मार्ग है। अब अवसर भी है और समय भी, चलो समर्पण करके देखते हैं। ओम शान्ति !!
आपके हृदय में ही प्रकाश है, उसका स्वरुप कैसा है ? कहाँ है ? किधर है ? इनका उत्तर आपको कोई भी नहीं दे सकता है ! यह एक खोज है जो व्यक्ति को इश्वर के चरणों में सम्पूर्ण समर्पण करके ही की जा सकती है।
ज्योति बिंदु को पहचानने का यह मूल मन्त्र है, इसके अभाव में आप ना जाने कितनी ही बार गुजर जायेंगे और वह ज्योति आपको दिखाई ही नहीं देगी। वह उसी स्थान पर है बरसों से लेकिन मुझे क्यों नहीं दिखाई देती है ?
उत्तर है की मेरे मन में ही तरह तरह के विचार हैं जो उसे पहचानने में बाधक हैं।
सभी शंका को दूर करके इश्वर के प्रति समर्पण ही ज्योति को प्राप्त करने का एक मार्ग है। अब अवसर भी है और समय भी, चलो समर्पण करके देखते हैं। ओम शान्ति !!
भजन श्रेणी : आध्यात्मिक भजन (Read More : Devotional Bhajan)
Jyoti Bindu ParmAatma Se E Meri AAatma...Brahma Kumari Bhajan
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जब आत्मा समर्पण करना सीख लेती है, तब वह शांत नहीं, प्रकाशित हो जाती है। यह उस क्षण का अनुभव है जब व्यक्ति को प्रतीत होता है कि जीवन केवल संघर्ष नहीं, एक यात्रा है जिसका गन्तव्य “परमानंद” है। ईश्वर कोई अलग सत्ता नहीं, बल्कि वह प्रकाश है जो हर अंधेरे में पहले से विद्यमान है — बस आत्मा को अपनी दृष्टि शुद्ध करनी होती है।
समर्पण यहाँ त्याग नहीं, पहचान है। जब आत्मा प्रभु को अपना जीवन अर्पित करती है, तब ईश्वर उससे कोई वस्तु नहीं माँगता — वह केवल प्रेम चाहता है। जो ईश्वर को पूर्णता से स्वीकार कर लेता है, उसे संसार में कुछ खोने का भय नहीं रहता। जैसे ज्योति में मिलकर पतंगा जलता नहीं, स्वयं प्रकाश बन जाता है—वैसे ही आत्मा भी ईश्वर में मिलकर अपना स्वरूप पाती है। यह अनुभव शब्दों से परे है; इसे केवल महसूस किया जा सकता है, जब ध्यान, प्रार्थना और प्रेम साथ मिल जाते हैं। तभी जीवन धन्य बनता है — क्योंकि तब हम जीवन नहीं, ज्योति से जीते हैं।
समर्पण यहाँ त्याग नहीं, पहचान है। जब आत्मा प्रभु को अपना जीवन अर्पित करती है, तब ईश्वर उससे कोई वस्तु नहीं माँगता — वह केवल प्रेम चाहता है। जो ईश्वर को पूर्णता से स्वीकार कर लेता है, उसे संसार में कुछ खोने का भय नहीं रहता। जैसे ज्योति में मिलकर पतंगा जलता नहीं, स्वयं प्रकाश बन जाता है—वैसे ही आत्मा भी ईश्वर में मिलकर अपना स्वरूप पाती है। यह अनुभव शब्दों से परे है; इसे केवल महसूस किया जा सकता है, जब ध्यान, प्रार्थना और प्रेम साथ मिल जाते हैं। तभी जीवन धन्य बनता है — क्योंकि तब हम जीवन नहीं, ज्योति से जीते हैं।
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Author - Saroj Jangir
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