मनमोहन तुझे रिझाऊं तुझे नित लाड़ भजन
मनमोहन तुझे रिझाऊं तुझे नित नए लाड़ लड़ाऊं
मनमोहन तुझे रिझाऊं,
तुझे नित नए लाड़ लड़ाऊं,
बसा के तुझे नैनन में,
छिपा के तुझे नैनन में।।
गीत बन जाऊं तेरी,
बांसुरी के स्वर का,
इठलाती बलखाती,
पतली कमर का,
पीला पटका बन जाऊं,
पीला पटका बन जाऊं,
बसा के तुझे नैनन में,
छिपा के तुझे नैनन में।।
घुँघरू बनूँ जो तेरी,
पायल का प्यारे,
पल पल चूमा करूँ,
चरण तुम्हारे,
तेरे संग संग नाचूँ गाऊं,
बसा के तुझे नैनन में,
छिपा के तुझे नैनन में।।
राधिका किशोरी संग,
रमण तुम्हारा,
मुझ को दिखा दो कभी,
ऐसा नज़ारा,
फिर चाहे मैं मर जाऊं,
फिर चाहे मैं मर जाऊं,
बसा के तुझे नैनन में,
छिपा के तुझे नैनन में।।
मनमोहन तुझे रिझाऊं,
तुझे नित नए लाड़ लड़ाऊं,
बसा के तुझे नैनन में,
छिपा के तुझे नैनन में।।
तुझे नित नए लाड़ लड़ाऊं,
बसा के तुझे नैनन में,
छिपा के तुझे नैनन में।।
गीत बन जाऊं तेरी,
बांसुरी के स्वर का,
इठलाती बलखाती,
पतली कमर का,
पीला पटका बन जाऊं,
पीला पटका बन जाऊं,
बसा के तुझे नैनन में,
छिपा के तुझे नैनन में।।
घुँघरू बनूँ जो तेरी,
पायल का प्यारे,
पल पल चूमा करूँ,
चरण तुम्हारे,
तेरे संग संग नाचूँ गाऊं,
बसा के तुझे नैनन में,
छिपा के तुझे नैनन में।।
राधिका किशोरी संग,
रमण तुम्हारा,
मुझ को दिखा दो कभी,
ऐसा नज़ारा,
फिर चाहे मैं मर जाऊं,
फिर चाहे मैं मर जाऊं,
बसा के तुझे नैनन में,
छिपा के तुझे नैनन में।।
मनमोहन तुझे रिझाऊं,
तुझे नित नए लाड़ लड़ाऊं,
बसा के तुझे नैनन में,
छिपा के तुझे नैनन में।।
Bhajan ।। मनमोहन तुझे रिझाऊं ।। Indresh Upadhyay Ji ।। Aastha Channel
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पूज्य इंद्रेश उपाध्याय जी के श्रीमुख से गाया गया यह सुंदर भजन जिसके बोल हैं, मनमोहन तुझे रिझाऊं...आपका मन मोह लेगा।
साधक का मन मनमोहन कन्हैया को नैनों में बिठाकर रिझाने को व्याकुल है, उन्हें नित नए लाड़ लड़ाने को आतुर है। वह स्वयं को उनकी बांसुरी का गीत, पतली कमर का इठलाता स्वर, पीला पटका, घुँघरू या पायल बनाना चाहता है ताकि हर पल उनके चरण चूम सके, संग नाच सके गा सके। राधा किशोरी के साथ रमण का वह दिव्य नज़ारा पाने को प्राण तक उत्सर्ग करने को तैयार है, बस मन के कोने में कन्हैया को छिपाकर रखना चाहता है।
मनमोहन कन्हैया प्रेम के चोर हैं, जो भक्त को अपने रूप से मोहित कर लेते हैं और हृदय को माधुर्य रस से भर देते हैं। उनकी लीलाओं में बांसुरी, पीताम्बर और राधारानी का संग साधक को सच्चे समर्पण का पाठ पढ़ाता है। जो नैनों में बसाकर उन्हें निहारता है, उसके जीवन में वही प्रेम उमड़ता है जो गोपियों को ब्रज में प्राप्त हुआ, और हर सांस भक्ति के रंग में रंग जाती है।
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Author - Saroj Jangir
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