प्रबल झंझावात में तू बन अचल हिमवान रे मन
प्रबल झंझावात में तू बन,
अचल हिमवान रे मन,
प्रबल झंझावात में तू बन,
अचल हिमवान रे मन।
हो बनी गंभीर रजनी,
सूझती हो नहीं अवनी,
ढल न अस्ताचल अचल में,
बन सुवर्ण विहान रे मन,
प्रबल झंझावात में तू बन,
अचल हिमवान रे मन।
उठी रही हो सिन्धु लहरी,
हो न मिलती थाह गहरी,
नील नीरधि का अकेला,
जन सुभग जलयान रे मन,
प्रबल झंझावात में तू बन,
अचल हिमवान रे मन।
कमल कलियाँ सकुचती हों,
रश्मियाँ भी मचलती हों,
तू तुषार कुहा गगन में बन,
मधुप की तान रे मन,
प्रबल झंझावात में तू बन,
अचल हिमवान रे मन।
प्रबल झंझावात में तू बन,
अचल हिमवान रे मन,
प्रबल झंझावात में तू बन,
अचल हिमवान रे मन।