अरिहंतो का ध्यान धरो निर्ग्रंथों का मान करो

अरिहंतो का ध्यान धरो निर्ग्रंथों का मान करो


अरिहंतों का ध्यान धरो,
निर्ग्रंथों का मान करो,
जिनवाणी को शीश नमाकर,
धरो हृदय साभार,
कि तेरा मानुष जन्म अनमोल,
अरिहंतों का ध्यान धरो।

अनादि से कर्मों ने,
तुझको सताया,
कभी आत्म अनुभव का,
अवसर ना आया,
बड़े भाग्य से तूने,
जिन धर्म पाया,
दयालु गुरु ने है,
तुझको पढ़ाया,
कि इनके वचनों को,
अंतर में घोल,
अरिहंतों का ध्यान धरो।

समय आ गया अब तो,
मिथ्यात्व छोड़ो,
बस एक वीतरागी से,
संबंध जोड़ो,
गलत बह रही,
भाव धारा को मोड़ो,
सही ज्ञान से शैल,
कर्मों को तोड़ो,
स्वयं ही मुक्ति के,
द्वारों को खोल,
अरिहंतों का ध्यान धरो।

अरिहंतों का ध्यान धरो,
निर्ग्रंथों का मान करो,
जिनवाणी को शीश नमाकर,
धरो हृदय साभार,
कि तेरा मानुष जन्म अनमोल,
अरिहंतों का ध्यान धरो।



Jain Bhajan - अरिहंतों का ध्यान धरो | Kundalpur Bade Baba Ka Bhajan | Jain Song ‪@R_Jain_Melodies‬

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Written & Sung by: Dr. Rajeev Jain (Chandigarh, 8136086301).
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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