पहली बार मैं धाम मुआणा आया हूं भजन

पहली बार मैं धाम मुआणा आया हूं भजन


पहली बार मैं धाम मुआणा आया हूं,
जोतराम संग परिवार न ल्याया हूं।

जोतराम तेरी जग में सुनी,
बढ़ाई स मना,
लागी लग्न कसूती बाबा,
नहीं पता तन्ना,
बाबा जी मैं बहुत घणा दुःख पाया सूं,
जोतराम संग परिवार न ल्याया हूं।

जोतराम या लादी अर्ज,
तू मेट मर्ज मेरी,
इस बालक गेल्या बाबा,
होरी हेरा-फेरी,
आशा कर के तेरे धाम पे आया हूं,
जोतराम संग परिवार न ल्याया हूं।

फैन बतेरे स दुनिया में,
देवों का खटका,
जब मानूं तन्ना जोतराम,
दे शक्ति का झटका,
आंसू दर पे मैं टपकाता आया हूं,
जोतराम संग परिवार न ल्याया हूं।

रुक्का सुन्या कृष्ण भगत,
मुआणा गाम का,
देख विशाल तू इब नजारा,
इसके धाम का,
विक्की बुच्ची आले नै समझाया हूं,
जोतराम संग परिवार न ल्याया हूं।

पहली बार मैं धाम मुआणा आया हूं,
जोतराम संग परिवार न ल्याया हूं।


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तेरे धाम की चौखट पर पहली बार खड़े होने की वो हल्की-सी थरथराहट भीतर तक गूंज उठती है; हर कदम में आशा भी है और कुछ बची हुई टूटन भी, पर बचपन की तरह सीधा सा विश्वास कि यहाँ सब कुछ ठीक हो जाएगा। जोतराम के नाम की ही एक झलक मन की बाँहें खोल देती है—परिवार न सहेजकर आने की पीड़ा और अकेलेपन की जुबान में उतरी हिम्मत दोनों साथ-साथ दिखती हैं। आँसुओं में घुली वह विनती न केवल बोझ कम करने आती है, बल्कि उस आत्मिक समर्पण की तरह है जो जानती है कि यही स्थान सबसे बड़ा सहारा देगा। धाम की माटी, जो जेहन में पहले से नहीं थी, अब घर-सा लगने लगेती है; विश्वास का एक छोटा-सा दीपक भीतर जल उठा है जो गरीबी और दुःख की रातों को रोशन करने को तैयार है। यहाँ आकर आत्मा को आश्वासन मिला जैसे कोई पिता हाथ पकड़कर कह दे—तू अकेला नहीं, तेरी हर टूटती डोरी को यही दरबार जोड़ देगा।
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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