कौन मिलावै जोगिया हो भजन
कौन मिलावै जोगिया हो भजन
कौन मिलावै जोगिया हो,जोगिया बिन रह्यो न जाय।
मैं जो प्यासी पीवकी,
रटत फिरौं पिउ पीव।
जो जोगिया नहिं मिलिहै हो,
तो तुरत निकासूँ जीव।
गुरुजी अहेरी मैं हिरनी,
गुरु मारैं प्रेमका बान।
जेहि लागै सोई जानई हो,
और दरद नहिं जान।
कहै मलूक सुनु जोगिनी रे,
तनहिमें मनहिं समाय।
तेरे प्रेमकी कारने जोगी,
सहज मिला मोहिं आय।
Kaun Milave Jogiya Ho | Sant Maluk Das ji | Anandmurti Gurumaa (Hindi)
'Kaun milave jogiya ho' beautiful bhajan of Sant Maluk Das ji by revered master Anandmurti Gurumaa drawn from meditation retreat for NRI seekers in 2018 at Rishi Chaitanya Ashram.
यह दिल की गहरी प्यास है, जो बिना उस प्रेमी के मिले चैन नहीं लेती। जैसे कोई प्यासी हर पल उसी का नाम रटती फिरे, पीव-पीव पुकारती रहे, क्योंकि उस एक के बिना जीना असंभव लगता है। अगर वो जोगी, वो साथी न मिला तो जीव तुरंत निकल जाना चाहता है, क्योंकि ये विरह इतना भारी है कि सांस भी बोझ बन जाती है। गुरु उस हिरनी की तरह है जो शिकारी है, प्रेम का बाण चलाता है, और जिसे वो बाण लगता है, वही इसका असली दर्द समझ पाता है। बाकी दुनिया को तो कुछ पता ही नहीं चलता।
जब मन और तन में प्रेम समा जाता है, तो वो जोगी सहज ही मिल आता है। प्रेम की वजह से ही सब कुछ आसान हो जाता है, दूरी मिट जाती है। ये प्रेम इतना गहरा है कि बिना किसी कोशिश के द्वार खुल जाते हैं। ईश्वर का आशीर्वाद ऐसे ही प्रकट होता है, जब दिल पूरी तरह उसकी ओर झुक जाता है।
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