चकनाचूर भयो दरबार रघुवर बैठे सिंहासन भजन
चकनाचूर भयो दरबार रघुवर बैठे सिंहासन
चकनाचूर भयो दरबार,रघुवर बैठे सिंहासन पर,
चकनाचूर भयो दरबार,
रघुवर बैठे सिंहासन पर।
एक कहने लगा सिपाही,
मेरी टेर सुनो रघुराई,
तुमको चर्च रहा संसार,
रघुवर बैठे सिंहासन पर।
एक धोवी आज नगर में,
धोवन से लड़ रहा घर में,
तू पर घर क्यों गई मेरी नार,
रघुवर बैठे सिंहासन पर।
मैं ऐसा ना रघुराई,
सिया रावण घर रह आई,
फिर भी ली राम ने राख,
रघुवर बैठे सिंहासन पर।
जब सुनी सेवक की वाणी,
भर गया और आंख में पानी,
लक्ष्मण जी ने तुरंत बुलाए,
रघुवर बैठे सिंहासन पर।
सुन लक्ष्मण मेरे भाई,
सिया वन में देओ भिजवाई,
हमको चर्च रहा संसार,
रघुवर बैठे सिंहासन पर।
CHAKNACHUR BHAYO DARBAR RAGHUVAR SINGHASAN PAR BETHO।।चकनाचूर भयो दरबार रघुवर सिंहासन
दरबार में जब रघुवर सिंहासन पर विराजमान होते हैं, तो चारों तरफ़ शान और सत्ता की चमक छा जाती है। सिपाही की आवाज़ गूँजती है कि संसार में तुम्हारी चर्चा है, लोग तुम्हारी महिमा गाते हैं। लेकिन उसी दरबार में एक धोबी की बात भी पहुँच जाती है, जो घर में अपनी पत्नी से लड़ रहा है, कहता है कि तू रावण के घर में रही थी, फिर भी राम ने तुझे स्वीकार किया। वो बात सुनते ही रघुवर के मन में पीड़ा हो जाती है, आँखें भर आती हैं, क्योंकि प्रजा की जुबान पर भी लोक-लाज का बोझ है।
लक्ष्मण जी को बुलाया जाता है, और भाई से कहते हैं – सिया को वन में भेज दो। संसार की चर्चा से बचना है, प्रजा की बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये फैसला आसान नहीं था, लेकिन राजधर्म की अग्नि में जलकर भी राम ने वही किया जो धर्म और मर्यादा कहती थी। दरबार चकनाचूर हो गया था, क्योंकि वो सिंहासन सिर्फ़ सत्ता का नहीं, बल्कि त्याग और करुणा का भी प्रतीक था। रघुवर की वो आँखों में पानी की बूँदें बताती हैं कि राजा का दिल कितना बड़ा होता है, जो प्रजा की एक छोटी-सी बात को भी इतना गंभीरता से ले लेता है।
ईश्वर का आशीर्वाद सब पर बना रहे। जय श्री राम जी की।
SINGER : SUMAN SHARMA
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