पल्ले पड़ी चटोरी नार गुज़ारो नाये लंगूरिया

पल्ले पड़ी चटोरी नार गुज़ारो नाये लंगूरिया माता रानी भजन

 
पल्ले पड़ी चटोरी नार गुज़ारो नाये लंगूरिया

पल्ले पड़ी चटोरी नार,
गुजारो नाये लंगूरिया,
बिन मुंह धोये रोज़ सवेरे,
बिस्किट चाय उड़ाये,
बलम विचारो भूखो प्यासो,
करन चाकरी जाये,
पल्ले पड़ी चटोरी नार,
गुज़ारो नाये लंगूरिया।

सास ननद पे हुकुम चलावे,
नेक लाज ना आये,
ननद सभारे चूला चौका,
देवर परस जिमाये,
पल्ले पड़ी चटोरी नार,
गुज़ारो नाये लंगूरिया।

होत दुपहरी नहाय धोये के,
फ़िल्म देखने जाये,
होटल में वो चाट मिठाई,
बड़े प्रेम से खाये,
पल्ले पड़ी चटोरी नार,
गुज़ारो नाये लंगूरिया।

महीना भर की तांख्या वो,
दस दिन में दये उड़ाये,
सूख सूख भयो बालम कांटो,
नेक लाज ना खाये,
पल्ले पड़ी चटोरी नार,
गुज़ारो नाये लंगूरिया।


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लांगुरिया भजन माता रानी को समर्पित एक बहुत ही लोकप्रिय और पारंपरिक राजस्थानी तथा उत्तर भारतीय लोकगीत शैली है, जो विशेष रूप से कैला देवी (करौली, राजस्थान) के मंदिर में गाए जाते हैं। यह गीत शैली चंचल, संवादपूर्ण और भक्तिभाव से परिपूर्ण होती है, जिसमें भक्त (अक्सर एक महिला 'बनड़ी') और लांगुरिया (जो हनुमान जी का एक रूप माना जाता है और माता का सेवक है) के बीच मनोरंजक बातचीत होती है।
 
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