कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी रानी सती दादी
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी रानी सती दादी
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी,
तूने इतना दिया है,
मुझे प्यार मावड़ी,
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी।
सोचा ना समझा था मैंने,
तूने इतना दिया है,
दर–दर की मैंने ठोकर खाई,
तूने थाम लिया है,
मैं तो तेरी हुई हूँ,
कर्ज़दार मावड़ी,
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी।
अपनों के तानों को सुनकर,
मैं तो टूट गई थी,
हार गई थी, बिखर गई थी,
खुद से रूठ गई थी,
फिर तूने लिया है,
संभाल मावड़ी,
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी।
‘गंगा’ ने जिस दिन से तुझको,
अपना मान लिया है,
अपना सारा जीवन तेरे,
चरणों में सौंप दिया है,
यूँ ही सिर पे तू रखना,
अपना हाथ मावड़ी,
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी।
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी,
तूने इतना दिया है,
मुझे प्यार मावड़ी,
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी।
तूने इतना दिया है,
मुझे प्यार मावड़ी,
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी।
सोचा ना समझा था मैंने,
तूने इतना दिया है,
दर–दर की मैंने ठोकर खाई,
तूने थाम लिया है,
मैं तो तेरी हुई हूँ,
कर्ज़दार मावड़ी,
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी।
अपनों के तानों को सुनकर,
मैं तो टूट गई थी,
हार गई थी, बिखर गई थी,
खुद से रूठ गई थी,
फिर तूने लिया है,
संभाल मावड़ी,
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी।
‘गंगा’ ने जिस दिन से तुझको,
अपना मान लिया है,
अपना सारा जीवन तेरे,
चरणों में सौंप दिया है,
यूँ ही सिर पे तू रखना,
अपना हाथ मावड़ी,
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी।
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी,
तूने इतना दिया है,
मुझे प्यार मावड़ी,
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी।
कैसे करूँ धन्यवाद मावड़ी | Kaise Karu Danyawad Mavdi | रानी दादी जी का शुक्राना भजन | Ganga Sharma
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रानी सती दादी को राजस्थान और भारत के कई अन्य हिस्सों में पूजा जाता है। वह नारी शक्ति, साहस और पतिव्रत धर्म का प्रतीक मानी जाती हैं। किंवदंतियों के अनुसार, उनका असली नाम नारायणी देवी था, जिनका विवाह तनधन दास से हुआ था। उनके पति की मृत्यु के बाद, उन्होंने सती होने का निर्णय लिया, जो उस समय के समाज में एक उच्च बलिदान माना जाता था। उनके इस असाधारण साहस और निष्ठा के कारण, उन्हें "दादी जी" के रूप में पूजा जाने लगा। उनके भक्त मानते हैं कि वे अपने भक्तों को हर मुश्किल से बचाती हैं और उनकी सभी मनोकामनाएँ पूरी करती हैं। झुंझुनू (राजस्थान) में स्थित उनका मंदिर एक प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहाँ हर साल लाखों श्रद्धालु अपनी श्रद्धा व्यक्त करने आते हैं। रानी सती दादी की कथा हमें यह सिखाती है कि धर्म, विश्वास और नारी शक्ति का महत्व कितना गहरा है।
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पिया पहलम जाउंगी खाटू में
आज ते पाछे भोलेनाथ ना घोटूँ भँग
रानी सती दादी को राजस्थान और भारत के कई अन्य हिस्सों में पूजा जाता है। वह नारी शक्ति, साहस और पतिव्रत धर्म का प्रतीक मानी जाती हैं। किंवदंतियों के अनुसार, उनका असली नाम नारायणी देवी था, जिनका विवाह तनधन दास से हुआ था। उनके पति की मृत्यु के बाद, उन्होंने सती होने का निर्णय लिया, जो उस समय के समाज में एक उच्च बलिदान माना जाता था। उनके इस असाधारण साहस और निष्ठा के कारण, उन्हें "दादी जी" के रूप में पूजा जाने लगा। उनके भक्त मानते हैं कि वे अपने भक्तों को हर मुश्किल से बचाती हैं और उनकी सभी मनोकामनाएँ पूरी करती हैं। झुंझुनू (राजस्थान) में स्थित उनका मंदिर एक प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहाँ हर साल लाखों श्रद्धालु अपनी श्रद्धा व्यक्त करने आते हैं। रानी सती दादी की कथा हमें यह सिखाती है कि धर्म, विश्वास और नारी शक्ति का महत्व कितना गहरा है।
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Author - Saroj Jangir
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