शरण में आ पड़ा तेरी प्रभु मुझको भुलाना ना
शरण में आ पड़ा तेरी प्रभु मुझको भुलाना ना
शरण में आ पड़ा तेरी
प्रभु मुझको भुलाना ना।
तेरा है नाम दुनिया में
पतित पावन सभी जाने
देखकर दोष को मेरे
नजर मुझसे हटाना ना।
काल की है नदी भारी
बहा जाता हूं धारा में
पकड़ लो हाथ अब मेरा
नाथ देरी लगाना ना।
भगत तेरे हैं बहुतेरे
करे सुमिरन सदा मन में
जानकर दास दासनों का
मुझे उनसे छुड़ाना ना।
तेरा है रूप अविनाशी
जगत सारे में है पूरन
वो ब्रह्मानंद नैनन से
मेरे कबहुं छिपाना ना।
शरण में आ पड़ा तेरी
प्रभु मुझको भुलाना ना।
प्रभु मुझको भुलाना ना।
तेरा है नाम दुनिया में
पतित पावन सभी जाने
देखकर दोष को मेरे
नजर मुझसे हटाना ना।
काल की है नदी भारी
बहा जाता हूं धारा में
पकड़ लो हाथ अब मेरा
नाथ देरी लगाना ना।
भगत तेरे हैं बहुतेरे
करे सुमिरन सदा मन में
जानकर दास दासनों का
मुझे उनसे छुड़ाना ना।
तेरा है रूप अविनाशी
जगत सारे में है पूरन
वो ब्रह्मानंद नैनन से
मेरे कबहुं छिपाना ना।
शरण में आ पड़ा तेरी
प्रभु मुझको भुलाना ना।
Sudhanshu Ji Maharaj | Bhajan | Sharan Me Aa Pda Teri
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पूर्ण आत्मसमर्पण का क्षण वही है जब मन भीतर-बाहर की सारी आश्रयशक्ति छोड़कर मात्र प्रभु-चरणों की ओर देखता है। संसार के हर सहारे कमजोर पड़ जाते हैं; नाम, प्रसिद्धि, रिश्तों, धन, बुद्धि की कोई गारंटी नहीं रहती, लेकिन प्रभु का हाथ थामने से भीतर एक नया विश्वास जन्म लेता है। दोषों और कमजोरियों के बोझ से दबा हुआ मन आर्त पुकार करता है — उस स्नेहिल दृष्टि और कृपा की, जिसमें केवल क्षमा और सहारा मिलता है।
जीवन की प्रवाहमान धारा, समय का अंधकार और रिश्तों की बार बार टूटी डोर, सबकी सीमा वहीं आ जाती है, जहाँ प्रभु के चरणों की छांव मिलती है। उनकी उपस्थिति सौम्यता और निश्चिंतता का सागर है; छोटी सी प्रार्थना में पूरी सृष्टि का अनुसरण छुपा रहता है। प्रभु का रूप सम्पूर्णता का अनुभव देता है; मन की विकलता, निराधारता, भय और बंधन उनकी छवि में विलीन हो जाते हैं। उनके अविनाशी आनंद से हृदय का हर कोना प्रकाशित हो जाता है, और आत्मा को ऐसा मुक्त भाव मिलता है, जहाँ किसी और से तुलना ही नहीं।
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श्री जी हमारी हम श्री जी के
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श्री जी हमारी हम श्री जी के
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Author - Saroj Jangir
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