श्रीकृष्ण के सिरदर्द की कहानी

इस लेख में हम एक प्रेरणादायक कहानी को समझेंगे, जिसमें श्रीकृष्ण और राधा के बीच के अद्भुत प्रेम और समर्पण की भावना को दर्शाया गया है। यह कहानी न केवल भक्ति की महिमा बताती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि सच्चा प्रेम कैसा होना चाहिए। श्रीकृष्ण ने एक अनोखी लीला के माध्यम से नारद मुनि को यह संदेश दिया कि भक्ति में किसी प्रकार का अहंकार नहीं होना चाहिए। तो आइए, इस कहानी को विस्तार से जानते हैं और इसके माध्यम से जीवन के मूल्यवान सबक को समझते हैं।
 
श्रीकृष्ण के सिरदर्द की कहानी Shri Krishna Aur Sardad Ki Kahani

श्रीकृष्ण के सिरदर्द की कहानी

श्री कृष्णा और राधा का प्रेम अमर है। राधा और श्री कृष्ण के असीम प्रेम को कौन नहीं जानता है। हालांकि उनका विवाह नहीं हुआ था, लेकिन उनके प्रेम और समर्पण की मिसाल आज भी दी जाती है। कृष्ण का राधा के प्रति प्रेम और राधा का कृष्ण के प्रति संपूर्ण समर्पण अनोखा था। इसी कारण, अपने आपको श्रीकृष्ण का सबसे बड़ा भक्त मानने वाले नारद मुनि को राधा से जलन होने लगी। श्रीकृष्ण ने यह बात महसूस कर ली थी।

एक दिन, नारद मुनि श्री कृष्ण के पास राधा के बारे में बात करने आए। जैसे ही नारद वहां पहुंचे, श्री कृष्ण अपने सिर को पकड़कर बैठ गए। यह देखकर नारद मुनि ने पूछा, "प्रभु, आप अपना सिर पकड़ कर क्यों बैठे हैं?"

श्री कृष्ण ने कहा, "हे नारद मुनि, मेरे सिर में भयंकर दर्द हो रहा है।"

नारद मुनि ने सहानुभूति जताते हुए पूछा, "प्रभु, इस दर्द को कैसे ठीक किया जा सकता है?"

श्री कृष्ण ने उत्तर दिया, "यदि मैं अपने सबसे बड़े भक्त का चरणामृत पी लूं, तो मेरा सिरदर्द ठीक हो सकता है।"

यह सुनकर नारद मुनि विचार में पड़ गए। उन्हें स्वयं को श्री कृष्ण का सबसे बड़ा भक्त मानने का गर्व था, लेकिन उन्हें यह भी पता था कि अपना चरणामृत देना धर्म के खिलाफ माना जाता है और इसे पाप समझा जाता है। कुछ देर सोचने के बाद, नारद मुनि ने राधा का स्मरण किया और सोचा कि लोग राधा को भी श्री कृष्ण का सबसे बड़ा भक्त मानते हैं, इसलिए उनके पास जाकर पूछना चाहिए। इस प्रकार नारद मुनि ने अपने भविष्य एवं धर्म की चिंता करते हुए भगवान के सिर दर्द को दूर करने का प्रयास नहीं किया।

नारद मुनि राधा के पास गए और श्रीकृष्ण के सिरदर्द के बारे में सारी बात बताई। राधा ने तुरंत एक बर्तन में अपने चरणों को धोकर, चरणामृत नारद मुनि को देते हुए कहा, "मुनिवर, मुझे यह नहीं पता कि मैं कितनी बड़ी भक्त हूं, लेकिन मैं इतना जरूर जानती हूं कि अगर श्री कृष्ण को मेरे चरणामृत से आराम मिलता है, तो मैं हर यातना और पाप सहन करने के लिए तैयार हूं। मेरे स्वामी की पीड़ा मुझसे नहीं देखी जाती।"

राधा के इन शब्दों को सुनकर नारद मुनि का अहंकार टूट गया। उन्हें समझ में आ गया कि सच्ची भक्ति अहंकार और स्वार्थ से परे होती है। राधा ही श्री कृष्ण की सबसे बड़ी भक्त हैं, क्योंकि राधा जी ने अपने भविष्य की चिंता ना करते हुए श्री कृष्ण के सिर दर्द को दूर करने के उपाय के बारे में सोचा। यह देखने के पश्चात नारद मुनि को समझ में आ गया कि राधा जी ही श्री कृष्ण की परम भक्त हैं। उन्हें यह भी समझ आ गया कि श्री कृष्ण ने यह लीला केवल नारद मुनि को यह सिखाने के लिए रची थी।

जब नारद मुनि श्री कृष्ण के पास लौटे, तो उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने पूरे हृदय से श्री कृष्ण को प्रणाम किया और केवल एक ही शब्द उनके मुख से निकला, "राधे-राधे।" इस प्रकार नारद मुनि ने सच्ची भक्ति और प्रेम का अर्थ समझ लिया।

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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