बीरा रे पहली कमाई थारी परखो भजन
बीरा रे पहली कमाई थारी परखो भजन
मुए को हरी देत है,
कपड़ा लकड़ी आग।
जीवित नर चिंता करे,
ताको बड़ो अभाग।।
(मुखड़ा)
बीरा रे पहली कमाई थारी परखो,
ऐ पाछे रे कियो पछताए।
बीरा रे मूल घमायो कियो मुरखो,
जियोरी जनम चौरासी में जाए।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(अंतरा 1)
बीरा रे पाच खाणो रो गढ़ परखो,
ए ज्यारे ओले ओले उभा हरिया रे।
बीरा रे सतगुरु खोदे खेलता,
जिउरी बयार फरे रे बलाए।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(अंतरा 2)
बीरा रे बोदी वाड़ पे लैश री,
ऐ जियोरी पग रे दिधोड़ी ढल जाए।
बीरा रे नुगरा ने समझावता,
जियोरी पत सुगरा री जाए।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(अंतरा 3)
बीरा रे वेला जांती वोनिए,
ऐ जियोरी धुर लग झेले रे भार।
बीरा रे भिड़ पड़े रे विश्रामे,
जिओरी सैब रा ससियार।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(अंतरा 4)
बीरा रे तेरे गुनोरी गणविधि छोड़िए,
ऐ जब तख पिंजरे में स्वास।
बीरा रे प्राण पिंजरिया में वेरो पड़े,
ए जियोरी गुरुगम कबु ना जाए।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(अंतरा 5)
बीरा रे दोइलो मरगियो गुरुदेव रो,
ऐ असल खोदा री धार।
बीरा रे धार धरणे पग मेलजो,
जियोरी इनवाइड उतरो रे पार।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(पुनरावृत्ति मुखड़ा)
बीरा रे पहली कमाई थारी परखो,
ऐ पाछे रे कियो पछताए।
बीरा रे मूल घमायो कियो मुरखो,
जियोरी जनम चौरासी में जाए।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
कपड़ा लकड़ी आग।
जीवित नर चिंता करे,
ताको बड़ो अभाग।।
(मुखड़ा)
बीरा रे पहली कमाई थारी परखो,
ऐ पाछे रे कियो पछताए।
बीरा रे मूल घमायो कियो मुरखो,
जियोरी जनम चौरासी में जाए।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(अंतरा 1)
बीरा रे पाच खाणो रो गढ़ परखो,
ए ज्यारे ओले ओले उभा हरिया रे।
बीरा रे सतगुरु खोदे खेलता,
जिउरी बयार फरे रे बलाए।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(अंतरा 2)
बीरा रे बोदी वाड़ पे लैश री,
ऐ जियोरी पग रे दिधोड़ी ढल जाए।
बीरा रे नुगरा ने समझावता,
जियोरी पत सुगरा री जाए।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(अंतरा 3)
बीरा रे वेला जांती वोनिए,
ऐ जियोरी धुर लग झेले रे भार।
बीरा रे भिड़ पड़े रे विश्रामे,
जिओरी सैब रा ससियार।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(अंतरा 4)
बीरा रे तेरे गुनोरी गणविधि छोड़िए,
ऐ जब तख पिंजरे में स्वास।
बीरा रे प्राण पिंजरिया में वेरो पड़े,
ए जियोरी गुरुगम कबु ना जाए।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(अंतरा 5)
बीरा रे दोइलो मरगियो गुरुदेव रो,
ऐ असल खोदा री धार।
बीरा रे धार धरणे पग मेलजो,
जियोरी इनवाइड उतरो रे पार।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
(पुनरावृत्ति मुखड़ा)
बीरा रे पहली कमाई थारी परखो,
ऐ पाछे रे कियो पछताए।
बीरा रे मूल घमायो कियो मुरखो,
जियोरी जनम चौरासी में जाए।
बीरा रे भजन विचारो भावरा भाव्या,
ए जूना जोगिया।।
वीरा रे पहली कमाई थारी पारख ले जैतपुरी गौशवामी नोहरा राजाराम साउंड मिठावी
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वीरा रे पहली कमाई थारी पारख ले जैतपुरी गौशवामी नोहरा राजाराम साउंड मिठावी 8141626120
राजाराम साउंड मिठावी 8141330320 मृत शरीर को भी ईश्वर कपड़ा, लकड़ी और आग का इंतजाम कर देते हैं। जीते जी इंसान अगर चिंता में डूबा रहे तो उससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। इस दुनिया में पहली कमाई को अच्छे से परख लेना चाहिए, बाद में पछताने से कुछ नहीं होता। मूर्ख की तरह अगर असली धन को गंवा दिया तो जीवन चौरासी के फेर में फंस जाता है। इसलिए भजन को ध्यान से समझो, भाव से सोचो, हे पुराने जोगिया।
पांच इंद्रियों के गढ़ को पहले अच्छी तरह जांच लो, जैसे हरिया खेत में हवा चलती है वैसे सतगुरु खुद खेलते हुए मार्ग दिखाते हैं। बोधि वाड़ पर पैर रखते ही लड़खड़ा जाए तो नुगरा को समझा दो, नहीं तो पत सुगरा की राह चली जाएगी। वेला जाते वक्त धुर से भार झेलना पड़ता है, भिड़ पड़ने पर विश्राम में साहब का ससियार मिलता है। गुनों की गणना छोड़ दो जब तक सांस पिंजरे में है, प्राण निकलने पर गुरु का गम कभी नहीं जाता। गुरुदेव की असल खोदा की धार पकड़ लो, पैर मजबूती से धार पर रखो तो पार उतर जाना आसान हो जाता है। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री गुरुदेव जी की।
राजाराम साउंड मिठावी 8141330320 मृत शरीर को भी ईश्वर कपड़ा, लकड़ी और आग का इंतजाम कर देते हैं। जीते जी इंसान अगर चिंता में डूबा रहे तो उससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। इस दुनिया में पहली कमाई को अच्छे से परख लेना चाहिए, बाद में पछताने से कुछ नहीं होता। मूर्ख की तरह अगर असली धन को गंवा दिया तो जीवन चौरासी के फेर में फंस जाता है। इसलिए भजन को ध्यान से समझो, भाव से सोचो, हे पुराने जोगिया।
पांच इंद्रियों के गढ़ को पहले अच्छी तरह जांच लो, जैसे हरिया खेत में हवा चलती है वैसे सतगुरु खुद खेलते हुए मार्ग दिखाते हैं। बोधि वाड़ पर पैर रखते ही लड़खड़ा जाए तो नुगरा को समझा दो, नहीं तो पत सुगरा की राह चली जाएगी। वेला जाते वक्त धुर से भार झेलना पड़ता है, भिड़ पड़ने पर विश्राम में साहब का ससियार मिलता है। गुनों की गणना छोड़ दो जब तक सांस पिंजरे में है, प्राण निकलने पर गुरु का गम कभी नहीं जाता। गुरुदेव की असल खोदा की धार पकड़ लो, पैर मजबूती से धार पर रखो तो पार उतर जाना आसान हो जाता है। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री गुरुदेव जी की।
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Author - Saroj Jangir
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