एक अचम्भा देखा रे भाई ठाड़ा सिंह भजन
ठाड़ा सिंह चरावै गाई।
पहले पूत पीछे भई माई,
चेला के गुरु लगै पाई॥
जल की मछली तरूवर व्याई,
पकड़ि बिलाई मुर्गा खाई॥
बैलहि डारि गूति घर लाई,
कुत्ता कूलै गई विलाई॥
धरति उलटि आकासहि जाई।
चिउटी के मुख हस्ति समाई॥
बिन पौने जहं परबत उड़ै।
जीव जन्तु सब बिरछा बुड़ै॥
सुखे सरवर उठै हिलोर।
बिन जल चकबा करै किलोल॥
Ek Achmbho Dekhyo Meri Maay Ban Me Chara Lyayi Singh Ne Gaay By Vikash Nath Ji Maharaj
एक अचम्भा देखा रे भाई, ठाड़ा सिंह चरावै गाई।
Ek Achambho Dekho Re Bhai, Thada Singh Charave Gaai.
I saw a wonderful act that lion stood herding the cows.
पहले पूत पीछे भई माई, चेला के गुरु लगै पाई॥
Pahale Poot Pichhe Bhai Mata, Chela Ke Guru Lage Paai.
Another wonder is that son was born first then his mother, Guru falls at the feet of his despile.
जल की मछली तरूवर व्याई, पकड़ि बिलाई मुर्गा खाई॥
Jal Ki Machhali Taruvar Byai, Pakadi Bilaai Murga Khaai.
Normaly fish gave birth in water but what is wonder that fish gave birth on a tree, then the Chicken caught cat and ate.
बैलहि डारि गूँनि घरि आई, कुत्ता कूँ लै गई बिलाई॥
bailahi ḍāri gūni ghari āī, kuttā kū lai gaī bilāī॥
धरति उलटि आकासहि जाई। चिउटी के मुख हस्ति समाई॥
dharati ulaṭi ākāsahi jāī। ciuṭī ke mukha hasti samāī॥
बिन पौने जहं परबत उड़ै। जीव जन्तु सब बिरछा बुड़ै॥
bina paune jahaṃ parabata uḍaai। jīva jantu saba birachā buḍāi॥
सुखे सरवर उठै हिलोर। बिन जल चकबा करै किलोल॥
sukhe saravara uṭhai hilora। bina jala cakabā karai kilola॥
तलि करि साषा उपरि करि मूल । बहुत भांति जड़ लागै फूल ॥
tali kari sāṣā upari kari mūla । bahuta bhāṃti jada lāgai phūla॥
कहै कबीर या पद कूं बूझै । ताकूं तीन्यूं त्रीभुवन सूझै ॥
kahai kabīra yā pada kūṃ būjhai । tākūṃ tīnyūṃ trībhuvana sūjhai॥
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
ईण र् गांव री उलटी रीत।
नीच छान ऊपर न भींत ।
चरियां को पाणी मंडेरी चढ़ जाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
चरियां को पाणी मंडेरी चढ़ जाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
आग जल्ड़ चूल्हों बुत जाय।
पोवण वाळी न रोटी खाय।
पोवण वाळी न रोटी खाय।
छोर की गोड्या में छोर की माय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
कह गए नाथ जी ऐसी वाणी।
कह गए नाथ जी ऐसी वाणी।
बिन जल ताल भर्-या है पाणी।
बिन जल ताल भर्-या है पाणी।
पेड़ कट ओर फल लग जाय
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
हंर एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
हंर एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
कह गए गोरख उल्टी वाणी।
कह गए गोरख उल्टी वाणी।
दूध का दूध और पाणी का पाणी।
दूध का दूध और पाणी का पाणी।
परखण वाळा तुरन्त मार जाए।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय ।
कह गए गोरख उल्टी वाणी।
कह गए गोरख उल्टी वाणी।
दूध का दूध और पाणी का पाणी।
दूध का दूध और पाणी का पाणी।
परखण वाळा तुरन्त मार जाए।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
एक अचम्भो देख्यो मेरी माय, वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
वन म चरा ल्याई सिंघ न गाय।
कबीर का यह दोहा सृष्टि के उलटबाँसी चित्र को सामने लाता है, जो मन को सत्य की खोज की ओर मोड़ता है। संसार की माया ऐसी है—जहाँ गाय सिंह चराए, माँ बाद में जन्मे, चेला गुरु को पाठ पढ़ाए। मछली पेड़ पर चढ़े, बिल्ली मुर्गा खाए, बैल गोबर लाए, कुत्ता भौंककर बिल्ली भागे।
धरती उलटकर आकाश बने, चींटी हathi को निगले, पहाड़ बिना हवा के उड़ें, जीव-जंतु पेड़ में डूबें। सूखा सरोवर लहराए, चकवा बिना जल के किलकारी मचाए। यह सब माया का खेल है, जो सिखाता है—संसार की हर बात उलझन, केवल सत्य ही स्थिर। कबीर कहते हैं, इस मायावी चक्र से निकलो, राम-नाम में डूबो, वही असली ठौर है, जैसे नदी का पानी सागर में मिलकर एक हो जाए।
रहस्यमई और गूढ़ अर्थ को परिभाषित करती हुई यह कबीर साहेब की उलटबासी भजन है। उलटबासी से आशय है की सरल भाषा के स्थान पर विरोधाभाषी शब्दों का उपयोग किया जाता है जो प्रचलित अर्थों के विपरीत भाव प्रकट करती हैं। ऋग्वेद में भी कई स्थानों पर उलटबासी का उपयोग देखने में मिलता है।
यथा -
चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य ।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ आ विवेश ॥
अवधू ऐसा ग्यान विचारै।
भेरैं बढ़े सु अधधर डूबे, निराधार भये पारं।। टेक।।
ऊघट चले सु नगरि पहूँते, बाट चले ते लूटे।
एक जेवड़ी सब लपटाँने, के बाँधे के छूटे।।
मँड़ये के चारन समधी दीन्हा, पुत्र व्यहिल माता॥
दुलहिन लीप चौक बैठारी। निर्भय पद परकासा॥
भाते उलटि बरातिहिं खायो, भली बनी कुशलाता।
पाणिग्रहण भयो भौ मुँडन, सुषमनि सुरति समानी,
कहहिं कबीर सुनो हो सन्तो, बूझो पण्डित ज्ञानी॥
एक अचम्भा देखा रे भाई
ठाड़ा सिंह चरावै गाई
पहले पूत
पहले पूत पीछे भई माई
चेला के गुरु लगै पाई
ठाड़ा सिंह चरावै गाई
जल की मछली
पकड़ि बिलाई मुर्गा खाई
बैलहि डारि गूति घर लाई
कुत्ता कूलै गई विलाई
एक अचम्भा देखा रे भाई
ठाड़ा सिंह चरावै गाई
तलि करि साषा उपरि करि मूल
बहुत भांति जड़ लागै फूल
तलि करि साषा उपरि करि मूल
बहुत भांति जड़ लागै फूल
कहै कबीर या पद कूं बूझै
ताकूं तीन्यूं त्रीभुवन सूझै
ठाड़ा सिंह चरावै गाई
एक अचम्भा देखा रे भाई
ठाड़ा सिंह चरावै गाई
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Author - Saroj Jangir
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