समझ मन माँयलारै रत्तिनाथ जी भजन
समझ मन माँयलारै रत्तिनाथ जी भजन
समझ मन माँयलारै, बीरा मेरा मैली चादर धोय।बिन धोयाँ दुख ना मिटै रै, बीरा मेरा तिरणा किस बिध होय॥
देवी सुमराँ शारदा रै, बीरा मेरा हिरदै उजाला होय।
गुरुवाँ री गम गैला मिल्या रे, बीरा मेरा आदु अस्तल जोय॥
दाता चिणाई बावड़ी रै, ज्यामें नीर गगजल होय।
कई कई हरिजन न्हा चल्या रै, कई गया है जमारो खोय॥2॥
रोईड़ी रंग फूटरो रै, जाराँ फूल अजब रंग होय।
ऊबो मिखमी भोम मे रै, जांकी कलियन विणजै कोई॥3॥
चंदन रो रंग सांवलो रै, जाँका मरम न जाने कोय।
काट्या कंचन निपजै रै, ज्यामे महक सुगन्धी होय॥4॥
तन का बनाले कापडा रै, सुरता की साबुन होय।
सुरत शीला पर देया फटकाया रै, सतगुरु देसी धोय॥5॥
लिखमा भिखमी भौम में रै, ज्याँरो गाँव गया गम होय।
तीजी चौकी लांधजा रै, चौथी में निर्भय होय॥6॥
बलिहारी बलिहारी म्हारे सतगुरुवां ने बलिहारी।
बन्धन काट किया जीव मुक्ता, और सब विपत बिड़ारी॥टेर॥
वाणी सुनत परस सुख उपज्या, दुर्मति गयी हमारी।
करम-भरम का संशय मेट्या, दिया कपाट उधारी॥1॥
माया, ब्रह्म भेद समझाया, सोंह लिया विचारी।
पूरण ब्रह्म कहे उर अंदर, काहे से देत विड़ारी॥2॥
मौं पर दया करो मेरा सतगुरु, अबके लिया उबारी।
भव सागर से डूबत तार्या, ऐसा पर उपकारी॥3॥
गुरु दादू के चरण कमल पर, रखू शीश उतारी।
और क्या ले आगे रखू, सादर भेट तिहारी॥4॥
मन की मैली चादर को बिना धोए सुख नहीं मिलता। यह सत्य सिखाता है कि जीवन के दुख तभी मिटते हैं, जब आत्मा को भक्ति और ज्ञान से शुद्ध किया जाए। जैसे गंगा का जल पाप धोता है, वैसे ही शारदा की स्मृति हृदय में उजाला लाती है। गुरु का मार्गदर्शन वह दीप है, जो अंधेरे में रास्ता दिखाता है, और मन को अटल विश्वास देता है।
दाता की बावड़ी का निर्मल जल हरिजनों को नहलाता है, पर जो सच्चे मन से डुबकी लगाते हैं, वही मोक्ष पाते हैं। यह चिंतन मन को यह शिक्षा देता है कि बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा ही आत्मा को मुक्त करती है। जैसे चंदन का रंग गहरा होता है, पर उसकी सुगंध तभी फैलती है जब उसे काटा जाए, वैसे ही साधना की कठिनाईयों से गुजरकर ही मन सुगंधित बनता है।
तन को कपड़ा और सुरति को साबुन बनाकर, सतगुरु की शरण में चादर धोई जाती है। यह भक्ति केवल कर्म नहीं, बल्कि आत्मा का शीला पर फटकना है, जो हर भय और भटकाव को मिटाता है। तीसरी चौकी पार कर चौथी में कदम रखते ही मन निर्भय हो उठता है, जैसे कोई पथिक लंबी यात्रा के बाद घर की देहरी पर पहुँच जाए। यह मार्ग हर भक्त को सिखाता है कि सत्संग और सुमिरन ही वह रास्ता है, जो जीवन को गम से गाँव की ओर ले जाता है।
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