भगवान तुम्हारे मंदिर में मैं तुम्हें रिझाने

भगवान तुम्हारे मंदिर में मैं तुम्हें रिझाने आई हूँ भजन

भगवान तुम्हारे मंदिर में, भगवान तुम्हारे मंदिर में,
मैं तुम्हें रिझाने आई हूँ |
वाणी में तनिक मिठास नहीं, वाणी में तनिक मिठास नहीं,
मैं विनय सुनाने आई हूँ |
अति वंचित हूँ क्या भेंट धरूँ, अति वंचित हूँ क्या भेंट धरूँ
भगवान तुम्हारी सेवा में |
प्रभु के चरणों में फूलों के, प्रभु के चरणों में फूलों के
दो हार चढ़ाने आई हूँ |
पूजा को फल और पात्र नहीं, पूजा को फल और पात्र नहीं
फिर भी तो यह साहस देखा |
अभिमान भरा जो इस मन में, अभिमान भरा जो इस मन में
मैं उसे चढ़ाने आई हूँ |
प्रभु का चरणामृत लेने को, प्रभु का चरणामृत लेने को
दासी का कोई पात्र नहीं |
नैनों के खाली प्यालों में, नैनों के खाली प्यालों में
चरणामृत लेने आई हूँ |
भगवान तुम्हारे मंदिर में…..

Krishna Bhajan by Vinod Agarwal :- घनश्याम तुम्हारे मन्दिर में, मै तुम्हे रिझाने आई हूं! Ghanshyam .

सुंदर भजन में एक भक्त की सादगी और श्रीकृष्णजी के प्रति गहरी श्रद्धा की पुकार गूँजती है, जो अपने खाली हाथों और सच्चे मन से प्रभु को रिझाने की कोशिश करती है। यह वह भाव है, जो अपनी कमियों को स्वीकारते हुए भी प्रभु के चरणों में सब कुछ अर्पित कर देता है। भक्त का मन, भले ही वाणी में मिठास न हो, प्रभु के सामने विनम्रता से अपनी प्रार्थना रखता है, जैसे कोई सच्चा बच्चा अपनी माँ से दिल की बात कहता है।

अपनी वंचना और अभावों के बावजूद फूलों के हार चढ़ाने की बात उस शुद्ध प्रेम को दर्शाती है, जो बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि हृदय की भावना से प्रभु तक पहुँचता है। जैसे कोई विद्यार्थी अपनी सीमित समझ के साथ भी गुरु को कुछ देने की कोशिश करता है, वैसे ही यहाँ भक्त अपने मन का अभिमान तक प्रभु को समर्पित कर देता है, यह मानते हुए कि प्रभु सब कुछ स्वीकार करते हैं।

Krishna Bhajan by Vinod Agarwal :-
घनश्याम तुम्हारे मन्दिर में, मै तुम्हे रिझाने आई हूं!
वाणी में तनिक मिठास नहीं, पर विनय सुनाने आई हूं..

Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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