चल हंसा उस देश नाथ भजन
चल हंसा उस देश नाथ भजन
चल हंसा उस देश भजन चल हंसा उस देश समद जहा मोती रे |
मोती समद जहा मोती समद जहा मोती रे ||
चल हंसा उस देश निराला, बिन शशि भान रहे उजियारा |
जहा लागे ना चोट काल की, जगामग ज्योति रे ||
चल हंसा उस देश समद जहा मोती रे |
जब चलने की करी तैयारी, माया जाल फंस्या अतिभारी |
करले सोच विचार घड़ी दोय, होती रे ||
चल हंसा उस देश समद जहा मोती रे |
चाल पड्या जद दुविधा छूटी, पिछली प्रीत कुटुंब से टूटी |
हंसा भरी उड़ान, हंसिनी रोती रे ||
चल हंसा उस देश समद जहा मोती रे |
जाय किया समदर में बासा, फेर नहीं आवण की आशा |
गावै भानीनाथ, मोत सिर सोती रे ||
चल हंसा उस देश समद जहा मोती रे |
मोती समद जहा मोती समद जहा मोती रे ||
चल हंसा उस देश निराला, बिन शशि भान रहे उजियारा |
जहा लागे ना चोट काल की, जगामग ज्योति रे ||
चल हंसा उस देश समद जहा मोती रे |
जब चलने की करी तैयारी, माया जाल फंस्या अतिभारी |
करले सोच विचार घड़ी दोय, होती रे ||
चल हंसा उस देश समद जहा मोती रे |
चाल पड्या जद दुविधा छूटी, पिछली प्रीत कुटुंब से टूटी |
हंसा भरी उड़ान, हंसिनी रोती रे ||
चल हंसा उस देश समद जहा मोती रे |
जाय किया समदर में बासा, फेर नहीं आवण की आशा |
गावै भानीनाथ, मोत सिर सोती रे ||
चल हंसा उस देश समद जहा मोती रे |
Gulab Nathji // नाथजी का सुपरहिट भजन - चल हंसा उस देश || Gulab Nathji Bhajan || Nathji Bhajan
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जीवन की यात्रा में जब मनुष्य अपने पुराने संबंधों, मोह-माया और दुविधाओं से मुक्त होकर उस उच्चतर स्थान की ओर उड़ान भरता है, तब वह अपने भीतर की हंसी और आनंद को महसूस करता है, जबकि पुराने बंधन टूटने से कुछ पीड़ा भी होती है। यह भाव उस आंतरिक संघर्ष का प्रतीक है, जिसमें आत्मा सांसारिक मोह से अलग होकर आध्यात्मिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ती है।
उस देश में एक बार पहुँच जाने के बाद पुनः लौटने की इच्छा नहीं होती, क्योंकि वहाँ शाश्वत सुख और आत्मिक आनंद का निवास होता है। भानीनाथ की वंदना के साथ, यह अनुभव होता है कि आत्मा ने अपने वास्तविक स्वरूप को पा लिया है, जहाँ सब कुछ शुद्ध, निर्मल और दिव्य है।
- ओ मन बड़ो जबर रे संता O Man Bado Jabar Re
- कागा सब तन खाइयो के चुन चुन खाइयो माँस Kaga Sab Tan Khaiyo
- जितने प्रेमी तेरे मैं सबको शीश झुकाऊं Jitane Premi Tere
जीवन की यात्रा में जब मनुष्य अपने पुराने संबंधों, मोह-माया और दुविधाओं से मुक्त होकर उस उच्चतर स्थान की ओर उड़ान भरता है, तब वह अपने भीतर की हंसी और आनंद को महसूस करता है, जबकि पुराने बंधन टूटने से कुछ पीड़ा भी होती है। यह भाव उस आंतरिक संघर्ष का प्रतीक है, जिसमें आत्मा सांसारिक मोह से अलग होकर आध्यात्मिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ती है।
उस देश में एक बार पहुँच जाने के बाद पुनः लौटने की इच्छा नहीं होती, क्योंकि वहाँ शाश्वत सुख और आत्मिक आनंद का निवास होता है। भानीनाथ की वंदना के साथ, यह अनुभव होता है कि आत्मा ने अपने वास्तविक स्वरूप को पा लिया है, जहाँ सब कुछ शुद्ध, निर्मल और दिव्य है।