छोड़ो मत अपनी आन सीस कट जाए भजन
छोड़ो मत अपनी आन सीस कट जाए भजन
मत झुको अनय पर,भले व्योम फट जाए,
दो बार नहीं यमराज कंठ धरता है,
मरता है जो,एक बार ही मरता है।
तुम स्वयं मरण के मुख पर चरण धरो रे,
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे।
स्वातंत्र्य जाति की लगन,व्यक्ति की धुन है,
बाहरी वस्तु यह नहीं,भीतरी गुण है,
नत हुए बिना जो अशनि-घात सहती है,
स्वाधीन जगत में वही जाति रहती है,
वीरत्व छोड़ मत पर का चरण गहो रे,
जो पड़े आन,खुद ही सब आग सहो रे।
आंधियां नहीं जिसमें उमंग भरती हैं,
छातियां जहाँ संगीनों से डरती हैं,
शोणित के बदले जहाँ अश्रु बहता है,
वह देश कभी स्वाधीन नहीं रहता है।
पकड़ो अयाल,अंधड़ पर उछल चढ़ो रे,
किरिचों पर अपने तन का चाम मढ़ो रे।
उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है,
सुख नहीं,धर्म भी नहीं,न तो दर्शन है,
विज्ञान,ज्ञान वश नहीं,न तो चिंतन है,
जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है।
सबसे स्वतंत्र यह रस जो अनघ पिएगा,
पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा।
सुंदर भजन में स्वतंत्रता, वीरता और आत्मसम्मान की प्रबल भावना का उद्गार झलकता है, जो हर भारतीय के मन में देश और स्वयं की आन के लिए बलिदान की प्रेरणा जगाता है। यह भाव उस सत्य को प्रकट करता है कि जीवन में मृत्यु एक बार ही आती है, इसलिए आन और स्वाधीनता के लिए डटकर मुकाबला करना ही सच्चा वीरत्व है।
“छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए” का आह्वान भक्त को उस साहस की याद दिलाता है, जो अन्याय के सामने कभी नहीं झुकता, चाहे आकाश ही फट जाए। यह उद्गार मन को उस अनुभूति से जोड़ता है, जैसे कोई वीर मृत्यु के मुँह में चरण रखकर भी डरता नहीं। मरने से न डरने की प्रेरणा यह सिखाती है कि सच्चा जीवन वही है, जो स्वतंत्रता और सम्मान के लिए जिया जाए।
स्वतंत्रता को भीतरी गुण बताते हुए भजन यह दर्शाता है कि जो जाति बिना झुके विपत्तियों को सहती है, वही स्वाधीन रहती है। यह भाव उस सत्य को उजागर करता है कि वीरत्व और आत्मसम्मान ही स्वतंत्रता की नींव हैं। जैसे कोई विद्यार्थी अपने गुरु की सीख से कठिनाइयों पर विजय पाता है, वैसे ही यह भजन हर व्यक्ति को पराधीनता के चरणों को छोड़कर स्वयं की आग सहने की प्रेरणा देता है।
आँधियों से न डरने वाली छाती और शोणित के बदले अश्रु न बहाने का भाव देश की स्वाधीनता के लिए दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। यह उद्गार उस विश्वास को प्रकट करता है कि जो देश डर और कमजोरी को त्याग देता है, वही स्वतंत्र रहता है। किरचों पर तन का चाम मढ़ने की प्रेरणा वीरता की पराकाष्ठा को रेखांकित करती है।
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