घोर अंधकार हो चल रही बयार सोंग
घोर अंधकार हो चल रही बयार सोंग
घोर अंधकार हो,चल रही बयार, हो,यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।
शक्ति का दिया हुआ,शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ,यह स्वतंत्रता दिया,
रुक रही न नाव हो,जोर का बहाव हो,
आज गंग-धार पर यह दिया बुझे नहीं,
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है।
यह अतीत कल्पना,यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भावना,यह अनंत साधना,
शांति हो,अशांति हो,युद्ध,संधि,क्रांति हो,
तीर पर,कछार पर,यह दिया बुझे नहीं,
देश पर,समाज पर,ज्योति का वितान है।
तीन-चार फूल हैं,आस-पास धूल हैं,
बांस हैं,बबूल हैं,घास के दुकूल हैं,
वायु भी हिलोर दे,फूंक दे,झकोर दे,
कब्र पर,मजार पर,यह दिया बुझे नहीं,
यह किसी शहीद का पुण्य प्राण-दान है।
झूम-झूम बदलियां,चूम-चूम बिजलियां,
आंधियां उठा रहीं,हलचलें मचा रहीं,
लड़ रहा स्वदेश हो,शांति का न लेश हो,
क्षुद्र जीत-हार पर,यह दिया बुझे नहीं,
यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है।
- भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ
- ऐ मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन
- ये देश है वीर जवानों का
यह भाव उस सत्य को प्रकट करता है कि स्वतंत्रता का दिया, जो शक्ति और भक्ति से जला है, घोर अंधकार और बयार के बीच भी कभी बुझने वाला नहीं, क्योंकि यह देश के प्राणों के समान है। “आज द्वार-द्वार पर यह दिया बुझे नहीं” का आह्वान उस अटूट विश्वास को दर्शाता है कि स्वतंत्रता की ज्योति हर परिस्थिति में जलती रहेगी। यह उद्गार मन को उस अनुभूति से जोड़ता है, जैसे कोई साधक अपने दीपक को तूफान में भी सहेजकर रखता है। यह निशीथ का दिया, जो विहान ला रहा है, देश के उज्ज्वल भविष्य की आशा को रेखांकित करता है।
शक्ति और भक्ति से प्रज्वलित यह दिया गंगा की धार पर तीव्र बहाव के बीच भी स्थिर रहता है। यह भाव उस सत्य को उजागर करता है कि स्वदेश का यह दिया प्राणों के समान अनमोल है, जो अतीत की कल्पना, विनीत प्रार्थना और अनंत साधना से सजा है। जैसे कोई विद्यार्थी अपने गुरु की दी हुई ज्योति को हर कठिनाई में संभालता है, वैसे ही यह भजन देशवासियों को स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रेरित करता है।