दुनिया से सहारा क्या लेना तेरा एक सहारा
दुनिया से सहारा क्या लेना
दुनिया से सहारा क्या लेनातेरा एक सहारा काफी हैं,
कुछ कहने की क्या जरूरत हैं,
तेरा एक इशारा काफी हैं ॥
धन दौलत का क्या करना हैं,
इन महलो का क्या करना हैं ।
जिंदगानी चार दिनों की हैं,
चरणों में गुजरा काफी हैं ॥
दुनिया से सहारा क्या लेना
तेरा एक सहारा काफी हैं ॥
माना दुनिया रंगीन तेरी,
हर चीज बनाई हैं तुने ।
देखु तो क्या क्या देखु प्रभु,
बस तेरा नजारा काफी हैं ॥
दुनिया से सहारा क्या लेना
तेरा एक सहारा काफी हैं ॥
वैकुंठ नहीं और स्वर्ग नहीं,
हमें मुक्ति का क्या करना हैं ।
तेरे चरणों मे बस जगह मिले,
बस यही आसरा काफी हैं ॥
दुनिया से सहारा क्या लेना
तेरा एक सहारा काफी हैं ॥
सुन्दर भजन में भक्ति का सर्वोच्च भाव प्रकट होता है, जहाँ संसार की अस्थिरता और माया की क्षणिकता को त्यागकर भक्त केवल ईश्वर की शरण चाहता है। धन, महल, वैभव—ये सब जीवन में आते और जाते रहते हैं, लेकिन प्रभु का आश्रय शाश्वत है। यह भाव जीवन की गहन सच्चाई को उजागर करता है कि असली सुख सांसारिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि ईश्वर के चरणों में समर्पण में मिलता है।
भजन में यह अनुभूति स्पष्ट होती है कि जब व्यक्ति ईश्वर को ही अपना सहारा मान लेता है, तब उसे किसी अन्य चीज की आवश्यकता नहीं रहती। वैकुंठ और स्वर्ग की कामना भी तुच्छ प्रतीत होती है, क्योंकि यदि प्रभु के चरणों में स्थान मिल जाए, तो वही सच्ची मुक्ति है। संसार की रंगीनियों को देखने से अधिक महत्वपूर्ण है प्रभु के दिव्य दर्शन, क्योंकि उनकी कृपा से ही आत्मा का वास्तविक उत्थान होता है। प्रभु की भक्ति ही जीवन का सबसे बड़ा धन है। जय श्री हरि! उनकी कृपा सदा बनी रहे।
आपको ये पोस्ट पसंद आ सकती हैं