काना चालो मारा घेर कामछे पदावली
काना चालो मारा घेर कामछे मीरा बाई पदावली
काना चालो मारा घेर कामछे
काना चालो मारा घेर कामछे। सुंदर तारूं नामछे॥टेक॥
मारा आंगनमों तुलसीनु झाड छे। राधा गौळण मारूं नामछे॥१॥
आगला मंदिरमा ससरा सुवेलाछे। पाछला मंदिर सामसुमछे॥२॥
मोर मुगुट पितांबर सोभे। गला मोतनकी मालछे॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरन कमल चित जायछे॥४॥
काना चालो मारा घेर कामछे। सुंदर तारूं नामछे॥टेक॥
मारा आंगनमों तुलसीनु झाड छे। राधा गौळण मारूं नामछे॥१॥
आगला मंदिरमा ससरा सुवेलाछे। पाछला मंदिर सामसुमछे॥२॥
मोर मुगुट पितांबर सोभे। गला मोतनकी मालछे॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरन कमल चित जायछे॥४॥
कान्हा मारा घरआ ले चालू रे गोविंद देव जी न्यू भजन
प्रभु की निकटता और भक्ति की मधुरता का भाव इस भजन में बस्ता है। कन्हैया को घर बुलाने की आत्मीय पुकार यह दर्शाती है कि प्रभु हृदय के मंदिर में ही विराजते हैं। तुलसी का पौधा, राधा का नाम, और मंदिर की शोभा यह सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति सादगी और प्रेम में बसती है। जैसे आंगन में तुलसी की हरियाली मन को शीतलता देती है, वैसे ही प्रभु का नाम हृदय को शांति देता है। मंदिर में सासरे और ससुराल की बात सांसारिक रिश्तों के बीच भी प्रभु की उपस्थिति को रेखांकित करती है। कन्हैया की शोभा—मोर मुकुट, पीतांबर, मोतियों की माला—बाहरी नहीं, बल्कि भक्त के मन में उनकी छवि की सुंदरता है। प्रभु का नाम जपने से मन उनके चरणों में रम जाता है, और सांसारिक चिंताएं छट जाती हैं। उदाहरण के लिए, जैसे कोई अपने घर में प्रिय अतिथि को बुलाकर हर्षित होता है, वैसे ही भक्ति से प्रभु को हृदय में बुलाने से आत्मा आनंदित हो उठती है। उनके चरणों में मन की डोर बांधने से जीवन का हर क्षण प्रभु के प्रेम से भर जाता है।
डर गयोरी मन मोहनपास । डर गयोरी मन मोहनपास ॥१॥
बीरहा दुबारा मैं तो बन बन दौरी । प्राण त्यजुगी करवत लेवगी काशी ॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । हरिचरणकी दासी ॥३॥
फूल मंगाऊं हार बनाऊ । मालीन बनकर जाऊं ॥१॥
कै गुन ले समजाऊं । राजधन कै गुन ले समाजाऊं ॥२॥
गला सैली हात सुमरनी । जपत जपत घर जाऊं ॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । बैठत हरिगुन गाऊं ॥४॥
जाके मथुरा कान्हांनें घागर फोरी । घागरिया फोरी दुलरी मोरी तोरी ॥ध्रु०॥
ऐसी रीत तुज कौन सिकावे । किलन करत बलजोरी ॥१॥
सास हठेली नंद चुगेली । दीर देवत मुजे गारी ॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । चरनकमल चितहारी ॥३॥
बीरहा दुबारा मैं तो बन बन दौरी । प्राण त्यजुगी करवत लेवगी काशी ॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । हरिचरणकी दासी ॥३॥
फूल मंगाऊं हार बनाऊ । मालीन बनकर जाऊं ॥१॥
कै गुन ले समजाऊं । राजधन कै गुन ले समाजाऊं ॥२॥
गला सैली हात सुमरनी । जपत जपत घर जाऊं ॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । बैठत हरिगुन गाऊं ॥४॥
जाके मथुरा कान्हांनें घागर फोरी । घागरिया फोरी दुलरी मोरी तोरी ॥ध्रु०॥
ऐसी रीत तुज कौन सिकावे । किलन करत बलजोरी ॥१॥
सास हठेली नंद चुगेली । दीर देवत मुजे गारी ॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर । चरनकमल चितहारी ॥३॥
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