अपणे करम को वै छै दोस मीरा बाई पदावली
अपणे करम को वै छै दोस
अपणे करम को वै छै दोस, काकूं दीजै रे ऊधो अपणे।।टेक।।
सुणियो मेरी बगड़ पड़ोसण, गेले चलत लागी चोट।
पहली ज्ञान मानहिं कीन्ही, मैं मत ताकी बाँधी पोट।
मैं जाण्यूँ हरि अबिनासी, परी निवारोनी सोच।।
(छै=है, बगड़ पडोसन=पडोसी स्त्री, गेले=रास्ते में,
पोच=बुरा, निवारोनी=निवारण करो, सोच=चिंता)