मेरे बांके बिहारी लाल
इतना ना करिओ श्रृंगार
नजर तोहे लग जाएगी
तेरी सुरतिया पे मन मोरा अटका
प्यारा लागे तेरा पीला पटका
तेरी टेढ़ी मेढ़ी चाल
तू इतना ना करिओ श्रृंगार
नजर तोहे लग जाएगी,
मेरे बाँके बिहारी लाल।
तेरी मुरलिया पे मन मेरा अटका
प्यारा लागे तेरा नीला पटका।
तेरे घुँघराले वाले बाल
तू इतना ना करिओ श्रृंगार
नज़र तोहे लग जाएगी
मेरे बाँके बिहारी लाल।
तेरी कमरिया पे मन मोरा अटका
प्यारा लागे तेरा काला पटका
तेरे गल में वैजयंती माल
तू इतना ना करिओ श्रृंगार
नजर तोहे लग जाएगी
मेरे बाँके बिहारी लाल।
मेरे बांके बिहारी लाल
तू इतना ना करिओ श्रृंगार
नजर तोहे लग जाएगी
इतना ना करिओ श्रृंगार
नजर तोहे लग जाएगी
तेरी सुरतिया पे मन मोरा अटका
प्यारा लागे तेरा पीला पटका
तेरी टेढ़ी मेढ़ी चाल
तू इतना ना करिओ श्रृंगार
नजर तोहे लग जाएगी,
मेरे बाँके बिहारी लाल।
तेरी मुरलिया पे मन मेरा अटका
प्यारा लागे तेरा नीला पटका।
तेरे घुँघराले वाले बाल
तू इतना ना करिओ श्रृंगार
नज़र तोहे लग जाएगी
मेरे बाँके बिहारी लाल।
तेरी कमरिया पे मन मोरा अटका
प्यारा लागे तेरा काला पटका
तेरे गल में वैजयंती माल
तू इतना ना करिओ श्रृंगार
नजर तोहे लग जाएगी
मेरे बाँके बिहारी लाल।
मेरे बांके बिहारी लाल
तू इतना ना करिओ श्रृंगार
नजर तोहे लग जाएगी
जानिए क्यों कहते हैं श्री कृष्णा को बांके बिहारी : वैसे तो श्री कृष्णा जी के कई नाम हैं। भक्त उन्हें मुरली मनोहर, कनैह्या , मुरलीधर, नन्द लाला के नाम से पुकारते हैं लेकिन श्री कृष्ण का एक नाम और है और वो है "बांके बिहारी ". बांके बिहारी शब्द को अलग अलग देखें तो बांके का अर्थ है टेढ़ा और बिहारी का अर्थ होता है सदा मस्त रहने वाला और खुश रहने वाला। कहा जाता है की भगवान् का शरीर तीन जगह से टेढ़ा था इसलिए इनका नाम बांके पड़ा। वैसे कृष्ण जी बन ठन कर रहते थे और इनके काम भी टेढ़े और नटखट होते हैं इसलिए हमारे कन्हैया हैं बांके बिहारी। कृष्ण जी के बचपन के काम भी तो टेढ़े मेढ़े थे।
“बाँके है नंद बाबा, और यशोमती, बांकी घड़ी जन्मे है बिहारी,
श्री कृष्ण को बांके बिहारी के नाम से जानने के पीछे की जन्म कथा : श्री कृष्ण जी को बांके बिहारी के नाम से पुकारने के पीछे एक कथा है जो आपको भी पता होनी चाहिए। श्री कृष्ण के जन्म की बधाईयां बाटी जा रही थी और नन्द बाबा के घर ग्वाल बाल का ताँता लगा था। सुनंदा ने यसोदा से कहा की जन्म के बाद श्री कृष्ण को दूध पिलाना चाहिए आपने अभी तक कृष्ण को दूध नहीं पिलाया है। सुनंदा ने जसोदा से कहा की वो प्रसूता गृह के बाहर इस बात का ध्यान रखेगी की कोई अंदर ना आ पाए और यसोदा को श्री कृष्ण को दूध पिलाना चाहिए। सुनंदा प्रसूता ग्रह के बाहर खड़ी हो गयी।
यसोदा जी ने जब श्री कृष्ण को दूध पिलाने लिए अपने हाथों से उठाना चाहा तो देखा की कृष्ण जी बहुत कोमल हैं और सोचा की कही उनके हाथों से कृष्ण जी को चोट न लग जाए। यसोदा जी ने तब श्री कृष्ण तो टेढ़े होकर दूध पिलाना शुरू कर दिया ताकि कृष्ण जी को हाथों से चोट न लगे। कृष्ण जी ने तीन घूँट दूध के गटके ही थे की सुनंदा ने सोचा अब तक तो यसोदा भाभी ने कृष्ण को दूध पीला दिया होगा और उन्होंने खिड़की से देखा की यसोदा भाभी कृष्ण को टेढ़े लेटकर दूध पीला रही थी तो उसने टोकते हुए कहा की भाभी कृष्ण जी को टेढ़े होकर दूध मत पिलाओ ये टेढ़े हो जायेंगे। लेकिन तब तक कृष्ण जी तीन दूध के खूंट निगल चुके थे और तीन जगह से टेढ़े हो गए। तभी से कृष्ण जी को बांके बिहारी के नाम से जाना जाता है क्यों की एक तो वे बांके थे और दूसरा उनकी कुंडली का नाम बिहारी था। इस तरह बाँके बिहारी श्री कृष्ण का एक नाम बाँके बिहारी हुआ। वृन्दावन बिहारी लाल की जय ।
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श्री कृष्णा को बांके बिहारी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे अपनी बांकनी चाल और बिहारी प्रदेश में रहने के कारण जाने जाते हैं। "बाँके" का अर्थ है "टेढ़ा" या "तिरछा", और "बिहारी" का अर्थ है "बिहार का रहने वाला"। भगवान कृष्ण को बांके बिहारी के रूप में चित्रित किया जाता है, जिसमें वे एक तिरछी चाल से चलते हुए दिखाए जाते हैं। यह चाल उनकी विनोदपूर्ण और चपल प्रकृति का प्रतीक है। बिहारी प्रदेश, जो वर्तमान में भारत के बिहार राज्य में स्थित है, भगवान कृष्ण के बचपन का घर था। इस क्षेत्र में, भगवान कृष्ण ने अपनी लीलाएं कीं, और वे अक्सर बिहारी के रूप में पूजे जाते हैं।
बांके बिहारी मंदिर भारत के वृंदावन शहर में स्थित है। यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है, और यह एक महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थल है। मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में स्वामी हरिदास ने करवाया था। मंदिर में भगवान कृष्ण की एक काले रंग की मूर्ति है, जिसे बांके बिहारी के रूप में जाना जाता है। मूर्ति को बांसुरी बजाते हुए दिखाया गया है, और यह अपने सौंदर्य और आकर्षण के लिए प्रसिद्ध है।
बांके बिहारी मंदिर भारत के वृंदावन शहर में स्थित है। यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है, और यह एक महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थल है। मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में स्वामी हरिदास ने करवाया था। मंदिर में भगवान कृष्ण की एक काले रंग की मूर्ति है, जिसे बांके बिहारी के रूप में जाना जाता है। मूर्ति को बांसुरी बजाते हुए दिखाया गया है, और यह अपने सौंदर्य और आकर्षण के लिए प्रसिद्ध है।