तजौ मन हरि विमुखनि को संग भजन

तजौ मन हरि विमुखनि को संग भजन

तजौ मन हरि विमुखनि कौ संग ।
जिनकै संग कुबुद्धि उपजति है,
पड़त भजन में भंग ।
तजौ मन हरि विमुखनि कौ संग...

कहा होत पय पान कराएं,बिष नही तजत भुजंग ।
कागहिं कहा कपूर चुगाएं,स्वान नहवाऐ गंग ।
तजौ मन हरि विमुखनि कौ संग ।
जिनकै संग कुबुद्धि उपजति है,पड़तभजन में भंग ।
तजौ मन विमुखनि कौन संग...

खर कौ कहा अरगजा-लेपन,मरकट भूषण अंग ।
गज कौं कहा नहवाऐ सरिता,बहुरि धरै वह ढंग ।
तजौ मन हरि विमुखनि कौ संग ।
जिनकै संग कुबुद्धि उपजति है,पड़त भजन में भंग ।
तजौ मन हरि विमुखनि कौ संग...

पाहन पतित बान नहिं बेधत,रीतौ करत निषंग।
सूरदास खलकारी कमरि पै,चढत न दूजौ रंग
तजौ मन हरि विमुखनि कौ संग ।
जिनकै संग कुबुद्धि उपजति है,पड़त भजन में भंग ।
तजौ मन हरि विमुखनि कौ संग...

(भजन का भावार्थ)
भावार्थ:
हे मेरे मन ! जो जीव हरि भक्ति से विमुख हैं, उन प्राणियों का संग न कर। उनकी संगति के माध्यम से तेरी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी क्योंकि वे तेरी भक्ति में रुकावट पैदा करते हैं, उनके संग से क्या लाभ? [1]
आप चाहे कितना ही दूध साँप को पिला दो, वो ज़हर बनाना बंद नहीं करेगा एवं आप चाहे कितना ही कपूर कौवे को खिला दो वह सफ़ेद नहीं होगा, कुत्ता (स्वान) कितना ही गंगा में नहा ले वह गन्दगी में रहना नहीं छोड़ता। [2]
आप एक गधे को कितना ही चन्दन का लेप लगा लो वह मिट्टी में बैठना नहीं छोड़ता, मरकट (बन्दर) को कितने ही महंगे आभूषण मिल जाए वह उनको तोड़ देगा। एक हाथी द्वारा नदी में स्नान करने के बाद भी वह रेत खुद पर छिड़कता है। [3]
भले ही आप अपने पूरे तरकश के तीर किसी चट्टान पर चला दें, चट्टान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। श्री सूरदास जी कहते हैं कि "एक काले कंबल दूसरे रंग में रंगा नहीं जा सकता (अर्थात् जिस जीव ने ठान ही लिया है कि उसे कुसंग ही करना है तो उसे कोई नहीं बदल सकता इसलिए ऐसे विषयी लोगों का संग त्यागना ही उचित है)।" [4]
 
तजौ मन हरि बिमुखन को संग ।इस भजन
में बताया गया है कि संत श्री सूरदास जी
महाराज कहते हैं कि है मन ऐसे लोगों का
ऐसे व्यक्तियों का संग त्याग दो जो आपको
प्रभु से दूर करते हैं जिनके साथ रहने से
बुरे विचार आते है और भजन में भंग पड़ता
है उनका संग त्याग देना चाहिए हे मेरे मन
जो जीव हरि भक्ति से विमुख हैं उन
प्राणियों का संग न कर उनकी संगति के
माध्यम से तेरी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी क्योंकि
वे तेरी भक्ति में रुकावट पैदा करते हैं उनके
संग से क्या लाभ
आप चाहे कितना ही साँप को दूध पिला दो
वो ज़हर बनाना बंद नहीं करेगा एवं आप
चाहे कितना ही कपूर कौवे को खिला दो
वह सफ़ेद नहीं होगा कुत्ता कितना ही गंगा
में नहा ले वह गन्दगी में रहना नहीं छोड़ता
आप एक गधे को कितना ही चन्दन का लेप
लगा लो वह मिट्टी में बैठना नहीं छोड़ता
मरकट (बन्दर) को कितने ही महंगे
आभूषण मिल जाए वह उनको तोड़ देगा ।
एक हाथी द्वारा नदी में स्नान करने के बाद
भी वह रेत खुद पर छिड़कता है ।
भले ही आप अपने पूरे तरकश के तीर
किसी चट्टान पर चला दें चट्टान पर कोई
प्रभाव नहीं पड़ेगा श्री सूरदास जी कहते हैं
कि एक काले कंबल दूसरे रंग में रंगा नहीं
जा सकता (अर्थात जिस जीव ने ठान ही
लिया है कि उसे कुसंग ही करना है तो उसे
कोई नहीं बदल सकता इसलिए संत श्री
सूरदास जी महाराज कहते हैं ऐसे विषयई
लोगों का संग त्यागना ही उचित है और
भगवान के भजन में लग जाना ही जीवन
की सार्थकता है।)
तजौ मन हरि विमुखनि कौ संग ।
जिनकै संग कुबुद्धि उपजति है,पड़त
भजन में भंग ।
तजौ मन हरि विमुखनि कौ संग...



।। तजौ रे मन हरि विमुखन को संग ।। श्री सूरदास जी ।। Shri Indresh Ji ।। Tajo Re Mann Hari ।। Talhati

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Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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