मत कर तू अभिमान रे बंदे जूठी तेरी शान अनूप जलोटा
मत कर तू अभिमान रे बंदे
जूठी तेरी शान रे
मत कर तू अभिमान
तेरे जैसे लाखों आये
लाखों इस माटी ने खाए
रहा ना नाम निशान रे बंदे
मत कर तू अभिमान
माया का अन्धकार निराला
बाहर उजला अन्दर काला
इस को तू पहचान रे बंदे
मत कर तू अभिमान
तेरे पास हैं हीरे मोती
मेरे मन मंदिर में ज्योति
कौन हुआ धनवान रे बंदे
मत कर तू अभिमान
जूठी तेरी शान रे
मत कर तू अभिमान
तेरे जैसे लाखों आये
लाखों इस माटी ने खाए
रहा ना नाम निशान रे बंदे
मत कर तू अभिमान
माया का अन्धकार निराला
बाहर उजला अन्दर काला
इस को तू पहचान रे बंदे
मत कर तू अभिमान
तेरे पास हैं हीरे मोती
मेरे मन मंदिर में ज्योति
कौन हुआ धनवान रे बंदे
मत कर तू अभिमान
MAT KAR TU ABHIMAAN BY ANUP JALOTA
यह भजन अहंकार का विनम्र परन्तु तीखा निवारक संदेश देता है: ऐ मनुष्य, अपनी दिखावटी शान पर अभिमान मत कर, क्योंकि तुम उन अनगिनत लोगों में से हो जिन्हें यही मृगतृष्णा बेलाग कर लेती है और अंततः वही मिट्टी सबको अपने भीतर समेट लेती है — नाम, निशान और वैभव का कोई स्थायी ठिकाना नहीं रहता। माया का अन्धकार ऐसा है कि वह बाहर सब कुछ चमकदार दिखाता है जबकि अंदर क्षरण और अँधेरा छिपा होता है; इसलिए सतर्क रहो और इस माया की चाल पहचानकर अहंकार छोड़ दो। असली संपत्ति यहाँ भौतिक हीरे-मोती नहीं, बल्कि आत्मा में प्रज्वलित मन का मंदिर है; जब भीतर ज्योति जलती है तो वही सच्ची दौलत बनती है — इस समझ के साथ अभिमान त्यागो और विनम्रता अपनाओ।
