शरणों छोड़ दाता कहाँ जाऊँ कबीर साहेब

शरणों छोड़ दाता कहाँ जाऊँ कबीर साहेब

शरण छोड़ दाता कहाँ जाऊँ,
मेरे औरन कोई,
तुम से दूजा काल है,
देखिया कर टोही,
शरण छोड़ दाता कहाँ जाऊँ।

मात पिता हेतु बंधना,
आप रहे सुख रोई,
मेरे तो सब सुख आप हो,
आप रहे मुख जोई,
शरण छोड़ दाता कहाँ जाऊँ।

गुण तो मुझमें हैं नहीं,
औगुण बहुतेरा होई,
ओट लीनी आपरे नाम री,
राखो नी पत सोई,
शरण छोड़ दाता कहाँ जाऊँ।

मैं गरजी अरजी लिखूं,
मर्जी जस होई,
अरजी विपत्ति लिखूं आपने,
राखूं नहीं गोई,
शरण छोड़ दाता कहाँ जाऊँ।

सतगुरु तुम चिन्हावणा,
मत बुद्धि सब खोई,
सकल जीवों रे आप हो,
दूजा ना कोई,
शरण छोड़ दाता कहाँ जाऊँ।

धर्मीदास सत साहिबा,
घट~घट में समोई,
साहिब कबीर सा सतगुरु मिलिया,
आवागमन निवोई,
शरण छोड़ दाता कहाँ जाऊँ।

शरण छोड़ दाता कहाँ जाऊँ,
मेरे औरन कोई,
तुम से दूजा काल है,
देखिया कर टोही,
शरण छोड़ दाता कहाँ जाऊँ।



॥संत नैनी बाई जी खारिया॥ = शरणों छोड़ साहिब कहां जाऊं

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Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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