क्या पानी में मल मल न्हावै भजन
क्या पानी में मल मल न्हावै भजन अनूप जलोटा
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर
राग: जंगला ताल
क्या पानी में मल मल न्हावै
मन को मैल उतार पियारे,
हाड़ माँस की देह बनी है
झरे सदा नवद्वार पियारे ।। १।।
क्या पानी में मल मल न्हावै
मन को मैल उतार पियारे,
पाप कर्म तन के नहिं छोड़े
कैसे होय सुधार पियारे ।।२।।
क्या पानी में मल मल न्हावै
मन को मैल उतार पियारे,
सत संगत तीरथ जल निर्मल
नित उठ गोता मार पियारे ।।३।।
क्या पानी,
ब्रह्मानंद भजन कर हरि का
जो चाहे निस्तार पियारे ।।४।।
क्या पानी में मल मल न्हावै
मन को मैल उतार पियारे,
Kyun Pani mein mal mal nahaye | Anoop Jalota
Title : kya pani me mal mal bhave
Raag: jangal taal
Kya pani me mal mal bhave
Man ko mail utar piyare,
Had mans ki deh bani hai
Jhare sada nav dwar piyare ||1||
Singer : Anoop Jalota
यह भजन संत कबीरदास जी की अमर वाणी है, जो बाहरी कर्मकांडों की निरर्थकता को गहराई से उकेरता है। माला फेरने से जुगभर बीत जाए, किंतु मन का विकार न मिटे, अतः बाहरी मनके छोड़कर अंतर्मन का चिंतन ही सार्थक है। केवल जल से शरीर धोना व्यर्थ है, क्योंकि हाड़-मांस की देह तो नश्वर है और मन का मैल—पाप, काम, क्रोध आदि—उससे नहीं उतरता; सच्ची शुद्धि तो सत्संगत और तीर्थ-जल के समान निर्मल संगति से ही आती है। यह हमें सिखाता है कि नित्य ब्रह्मानंद भजन कर हरि-नाम का गोता लगाओ, तभी पाप-बंधन टूटे और आत्मा निस्तार पाए, क्योंकि भक्ति ही वह अलौकिक स्नान है जो आंतरिक मैल धोकर परम शांति प्रदान करता है।
