उड़ उड़ रे म्हारा काळा रे कागला
इस लोक गीत मैं नायिका दूर देस में नौकरी के लिए गए पति की व्यथा को चित्रित करते हुए मुंडेर पर बैठे कौवे से कहती है की वह उड़ जाए और उसके प्रिय की खबर को लेकर आये। उसके प्रिय आने पर वह कौवे को खीर और शक़्कर का जिमावना करेगी और उसका एहसान मानेगी। विशेष है की राजस्थान की भौगोलिक परिस्थितियाँ बहुत ही जटिल होने के कारन पुरुषों को नौकरी के लिए बाहर जाना पड़ता था और ज्यादतर पुरुष सेनाओं में रहने के कारण अपने घर से दूर रहते थे। ऐसी परिस्तिति में वे अपने परिवार से दूर हो जाते थे और नायिका अपने पति के घर लौटने सबधी विचार करती है। कौवे का मुंडेर पर बोलना भी यही दर्शाता है की कोई मेहमान घर आने वाला है।
उड़ उड़ रे, उड़ उड़ रे,
उड़ उड़ रे, उड़ उड़ रे,
उड़ उड़ रे, म्हारा, काळा रे कागला,
कद म्हारां पिवजी घर आवें,
कद म्हारां पिवजी घर आवें, आवे र आवे,
कद म्हारां पिवजी घर आवें,
उड़ उड़ रे म्हारा काळा र कागला,
कद म्हारां पिवजी घर आवें,
खीर खांड रा जीमण जीमाऊँ,
सोना री चौंच मंढाऊ कागा,
जद म्हारां पिवजी घर आवें, आवे रे आवे,
उड़ उड़ रे, उड़ उड़ रे,
म्हारा काळा र कागला,
कद म्हारां पिवजी घर आवें,
पगला में थारे बांधू रे घुघरा,
गला में हार कराऊँ कागा,
जद म्हारां पिवजी घर आवें,
उड़ उड़ रे,
म्हारां काळा रे कागला,
कद म्हारां पिवजी घर आवें,
उड़ उड़ र महारा काला र कागला,
कद म्हारां पिवजी घर आवें,
जो तू उड़ने सुगन बतावे,
जनम जनम गुण गाऊँ कागा,
जद म्हारां पिवजी घर आवें , आवे र आवे,
जद म्हारां पिवजी घर आवें,
उड़ उड़ रे, उड़ उड़ रे,
उड़ उड़ रे, उड़ उड़ रे,
उड़ उड़ रे, म्हारा, काळा रे कागला,
कद म्हारां पिवजी घर आवें,
कद म्हारां पिवजी घर आवें, , आवे र आवे,
कद म्हारां पिवजी घर आवें,
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