सखी री मैं तो गिरधर के रंग राती भजन
सखी री मैं तो गिरधर के रंग राती भजन
सखी री मैं तो गिरधर के रंग राती,
पचरंग मेरा चोला रंगा दे, मैं झुरमुट खेलन जाती,
झुरमुट में मेरा सांई मिलेगा, खोल अडम्बर गाती,
चंदा जाएगा, सुरज जाएगा, जाएगा धरण अकासी,
पवन पाणी दोनों ही जाएंगे, अटल रहे अबिनासी,
गिरधर के रंग राती, मैं तो गिरधर के रंग राती,
सखी री मैं तो गिरधर के रंग राती,
सुरत निरत का दिवला संजो ले, मनसा की कर बाती,
प्रेम हटी का तेल बना ले, जगा करे दिन राती,
जिनके पिय परदेश बसत हैं, लिखि लिखि भेजें पाती,
मेरे पिय मो माहिं बसत है, कहूं न आती जाती,
पीहर बसूं ना बसूं सास घर, सतगुरु शबद संगाती,
ना घर मेरा ना घर तेरा, मीरा हरि रंग राती,
गिरधर के रंग राती, मैं तो गिरधर के रंग राती,
सखी री मैं तो गिरधर के रंग राती,
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मीराबाई का ये गीत जैसे दिल की गहराई से निकला हो, जहाँ सारी दुनिया फीकी पड़ जाती है और बस गिरधर का रंग ही बाकी रह जाता है। वो कहती हैं कि मैं तो गिरधर के रंग में रंग गई हूँ, पचरंगी चोला पहनकर झुरमुट में खेलने जाती हूँ। वहाँ साईं मिलेंगे, अडंबर खोलकर गाऊँगी, क्योंकि चाँद-सूरज, धरती-आकाश, पवन-पानी – सब कुछ एक दिन जाएगा, सिर्फ अविनासी गिरधर ही रहेंगे। ये रंग इतना गहरा है कि सांसों में घुल जाता है, और सारी दुनिया की मोह-माया पीछे छूट जाती है। जैसे कोई प्रेमी कहे, “अब बस तेरा रंग ही मेरी पहचान है, बाकी सब छूट जाए।”
सुरत-निरत का दीया संजो लेना है, मनसा की बाती बनानी है, प्रेम की हंडिया का तेल डालकर दिन-रात जलाना है। जिनके पिया परदेस में हैं, वो पाती लिख-लिखकर भेजती हैं, पर मेरे पिया तो मेरे ही माहिं बसते हैं, न आते हैं न जाते हैं। पीहर हो या ससुराल, न कोई घर मेरा, न तेरा – बस सतगुरु का शबद साथी है। मीरा हरि के रंग में रंगी है, और ये रंग कभी नहीं उतरता। गिरधर का नाम लेते ही मन हल्का हो जाता है, जैसे सारी थकान मिट गई हो, सारी जंजीरें टूट गई हों। बस एक बार उस रंग में डूब जाओ, तो जीवन खुद-ब-खुद होली बन जाता है, हर पल में गिरधर का साथ महसूस होता है।
Sakhi Ri Main Girdhar Ke Rang Raati - Bhajan · Parveen Sultana
The Best Of Parween Sultana
℗ 2020 Saregama India Ltd
Released on: 1983-12-31
Producer: N/a
Composer: Traditional
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