रोये रोये पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही जी
रोये रोये पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही जी
रोए रोए पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही जी
ऐसे जाकर नैनों, हाँ जी जाकर नैनों बरसते नीर।
व्याह रचावे भैया शिशुपाल से जी
ऐसे मेरा प्यार दुश्मन हो गया जी,
रोए रोए पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही जी।
आए खबरिया जल्दी मेरी लीजिए जी
ऐसे कोई नंद सुघन यदुवीर।
रोए रोए पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही जी।
जो नहीं आए जल्दी मेरे साँवरे जी
ऐसे अपने प्राणों को करूंगी मैं अखीर।
रोए रोए पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही जी।
ऐसे जाकर नैनों, हाँ जी जाकर नैनों बरसते नीर।
व्याह रचावे भैया शिशुपाल से जी
ऐसे मेरा प्यार दुश्मन हो गया जी,
रोए रोए पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही जी।
आए खबरिया जल्दी मेरी लीजिए जी
ऐसे कोई नंद सुघन यदुवीर।
रोए रोए पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही जी।
जो नहीं आए जल्दी मेरे साँवरे जी
ऐसे अपने प्राणों को करूंगी मैं अखीर।
रोए रोए पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही जी।
सावन की मल्हार || रोये रोये पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही
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सावन की मल्हार || रोये रोये पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही
Roye Roye Pati Rukmani Bitiya Likh Rahi Ji
Latest Sawan Ki Malhar,
Swar - Pujya Shri Ashok Krishna Thakur Ji
रुक्मिणी का मन प्रेम, पीड़ा और गहरे असहाय भाव से भरा हुआ है। आँखों से आँसू रुक नहीं रहे, और हर शब्द, हर पंक्ति में उसका दर्द झलकता है। उसका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया गया है, जबकि उसका मन और आत्मा केवल कृष्ण के लिए समर्पित है। यह प्रेम अब उसके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। रुक्मिणी की व्यथा इतनी गहरी है कि वह अपने आँसुओं के साथ कृष्ण को पत्र लिखती है, बार-बार यही पुकारती है कि कोई कृष्ण तक उसकी खबर पहुँचा दे। उसे विश्वास है कि केवल कृष्ण ही उसकी रक्षा कर सकते हैं, वही उसके सच्चे प्रेम के उत्तरदाता हैं।
मन में डर और निराशा है कि यदि कृष्ण समय पर नहीं आए, तो वह अपने प्राण त्याग देगी। यह प्रेम केवल सांसारिक आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार है—एक ऐसी पुकार जिसमें समर्पण, विश्वास और जीवन की अंतिम आशा छुपी है।
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बन गए श्याम तेरे बावरे सांवरे
सांवरिया नाम तुम्हारो लागे मन जीते प्यारा
श्रृंगार तेरा देखा तो तुझ में खो गया हूँ
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सावन की मल्हार || रोये रोये पाती रुक्मणि बिटिया लिख रही
Roye Roye Pati Rukmani Bitiya Likh Rahi Ji
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Swar - Pujya Shri Ashok Krishna Thakur Ji
रुक्मिणी का मन प्रेम, पीड़ा और गहरे असहाय भाव से भरा हुआ है। आँखों से आँसू रुक नहीं रहे, और हर शब्द, हर पंक्ति में उसका दर्द झलकता है। उसका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया गया है, जबकि उसका मन और आत्मा केवल कृष्ण के लिए समर्पित है। यह प्रेम अब उसके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। रुक्मिणी की व्यथा इतनी गहरी है कि वह अपने आँसुओं के साथ कृष्ण को पत्र लिखती है, बार-बार यही पुकारती है कि कोई कृष्ण तक उसकी खबर पहुँचा दे। उसे विश्वास है कि केवल कृष्ण ही उसकी रक्षा कर सकते हैं, वही उसके सच्चे प्रेम के उत्तरदाता हैं।
मन में डर और निराशा है कि यदि कृष्ण समय पर नहीं आए, तो वह अपने प्राण त्याग देगी। यह प्रेम केवल सांसारिक आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार है—एक ऐसी पुकार जिसमें समर्पण, विश्वास और जीवन की अंतिम आशा छुपी है।
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सांवरिया नाम तुम्हारो लागे मन जीते प्यारा
श्रृंगार तेरा देखा तो तुझ में खो गया हूँ
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Author - Saroj Jangir
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