थारो निर्मल निर्मल पानी भजन

थारो निर्मल निर्मल पानी भजन Tharo Nirmal Nirmal

 

थारो निर्मल निर्मल पानी,
नर्मदा महारानी महारानी,
महारानी ने कल्याणी,
नर्मदा महारानी महारानी।

माई थारा नीर मां ब्रम्हा जी नहाया,
ब्रम्हा जी नहाया मैया डुबकी लगाया,
थारी पूजा करे हो ब्रम्हाणी,
नर्मदा महारानी महारानी,
थारो निर्मल निर्मल पानी,
नर्मदा महारानी महारानी।

माई थारा नीर मां विष्णु जी नहाया,
विष्णु जी नहाया मैया डुबकी लगाया,
थारी सेवा करे हो लक्ष्मी रानी,
माँ नर्मदा निमाड़ी भजन,
नर्मदा महारानी महारानी,
थारो निर्मल निर्मल पानी,
नर्मदा महारानी महारानी।

अमरकण्ठ से आई नर्मदा,
घाट न घाट पुजाई नर्मदा,
तू तो सागर जाई न समानी,
नर्मदा महारानी महारानी,
थारो निर्मल निर्मल पानी,
नर्मदा महारानी महारानी।

थारो निर्मल निर्मल पानी,
नर्मदा महारानी महारानी,
महारानी ने कल्याणी,
नर्मदा महारानी महारानी। 



थारो निर्मल निर्मल पानी नरबदा महारानी | माँ नर्मदा निमाड़ी भजन | गायक कथावाचक अश्विन जी यदुवंशी

Thaaro Nirmal Nirmal Paani,
Narmada Mahaaraani Mahaaraani,
Mahaaraani Ne Kalyaani,
Narmada Mahaaraani Mahaaraani.

गायक: कथावाचक श्री #आश्विन यदुवंशी
कौरस: रिषिका निहाले एवं #बादल जोशी बरसलाय 
संगीत  : #योगेश कुशवाह जिराती एवं मयंक शर्मा 
मिक्स एण्ड मास्टरिंग : अंकुर जोशी ( #शुभवाणी स्टुडियो ) खरगोन 90394-56111
विडियो: गौरव जोशी 96171-72277
 
"थारो निर्मल निर्मल पानी, नर्मदा महारानी" नर्मदा माता का जल अत्यंत ही पवित्र और पावन है, जो हृदय में माँ नर्मदा के प्रति श्रद्धा और समर्पण जागृत करता है। नर्मदा माता, महारानी और कल्याणकारी माता है, जिनके निर्मल जल में ब्रह्मा और विष्णु जैसे देवताओं ने स्नान किया और उनकी पूजा ब्रह्माणी और लक्ष्मी रानी जैसी देवियाँ करती हैं। अमरकंटक से निकलकर सागर तक प्रवाहित होने वाली नर्मदा अपने हर घाट पर पूजी जाती है, और उनका जल पापों का नाश कर भक्तों को मोक्ष की ओर ले जाता है। यह भजन भक्त को यह विश्वास दिलाता है कि नर्मदा माता की भक्ति और उनके पवित्र जल के दर्शन-स्नान से जीवन की सारी बाधाएँ दूर होती हैं, मन शुद्ध होता है, और आध्यात्मिक शांति व कल्याण की प्राप्ति होती है। 
 
नर्मदा माता, जिन्हें रेवा के नाम से भी जाना जाता है, भारत की सात पवित्र नदियों में से एक हैं और मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तथा गुजरात की जीवनरेखा मानी जाती हैं। स्कंद पुराण के अनुसार, नर्मदा का उद्गम भगवान शिव के पसीने से मेकल पर्वत (अमरकंटक) पर हुआ, जब वे तपस्या में लीन थे। एक कथा के अनुसार, राजा हिरण्य तेजा ने 14,000 वर्षों की तपस्या कर शिव से नर्मदा को पृथ्वी पर लाने का वरदान माँगा, जिसके फलस्वरूप नर्मदा मगरमच्छ पर सवार होकर उदयाचल पर्वत से पश्चिम की ओर बहीं। दूसरी कथा में कहा गया है कि शिव और पार्वती ने उनके अलौकिक सौंदर्य को देखकर उनका नाम "नर्मदा" रखा, जिसका अर्थ है "सुख देने वाली"। नर्मदा की परिक्रमा, स्नान, और पूजा से पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति होती है, जैसा कि पुराणों में वर्णित है। 
 
यह नदी अमरकंटक से शुरू होकर 1,312 किलोमीटर की यात्रा करती हुई गुजरात के खम्भात की खाड़ी में अरब सागर में विलीन होती है। नर्मदा के तट पर कई प्राचीन तीर्थ जैसे ओंकारेश्वर, नेमावर, और महेश्वर बसे हैं, और इसके जल को इतना पवित्र माना जाता है कि इसमें स्नान करने से सारी नकारात्मकता धुल जाती है। नर्मदा जयंती, जो माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है, भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है, जहाँ वे नर्मदा माता की आरती और पूजा करते हैं। पुरातत्व विभाग के अनुसार, नर्मदा घाटी में प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष भी मिले हैं, जो इसे विश्व की प्राचीनतम नदी सभ्यताओं में से एक बनाते हैं। यह नदी न केवल आध्यात्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके तट पर बसे नगरों जैसे महिष्मती और भीमबैठका में इतिहास और संस्कृति के गहरे निशान मौजूद हैं।
 
नर्मदा माता की भक्ति और उनके जल में स्नान करने से भक्तों को मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा, और पापों से मुक्ति मिलती है। नर्मदा परिक्रमा, जो एक धार्मिक यात्रा है, भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति और जीवन की गहरी समझ प्रदान करती है। पुराणों के अनुसार, नर्मदा के तट पर तप करने वाले ऋषि-मुनियों, देवताओं और यहाँ तक कि भगवान विष्णु के अवतारों ने भी उनकी स्तुति की थी। नर्मदा का जल पीने या स्नान करने से सर्प विष का प्रभाव भी नष्ट होता है, और भक्तों को शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह नदी गोंडवाना समाज के लिए भी पवित्र है, जहाँ 14 जनवरी को उनके पूर्वजों की स्मृति में उत्सव मनाया जाता है। 
 
 
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