बरसाने की शोभा निराली हो गई
चलो भानु घर कीरती के लाली हो गई,
बरसाने की शोभा निराली हो गई।
देन बधाई चले लोग लुगाई,
बाजत वेणु शंख शहनाई,
आज सगरे री ब्रज में दिवाली हो गई,
चलो भानु घर कीरती के लाली हो गई,
बरसाने की शोभा निराली हो गई।
नाचत भानु संग नंदराय,
कीरति यशोदा भाग मनाए,
आज दौवन के घर की उजियारी हो गई,
चलो भानु घर कीरती के लाली हो गई,
बरसाने की शोभा निराली हो गई।
चिर जीवे किरत की राधा,
राधा गोविन्द ने याही को आराधा,
आज रसिको की जीवन रसाली हो गई,
चलो भानु घर कीरती के लाली हो गई,
बरसाने की शोभा निराली हो गई।
बरसाने की शोभा निराली हो गयी,
चलो भानु घर कीरती के लाली हो गई,
बरसाने की शोभा निराली हो गई।
बरसाने की शोभा निराली हो गई , चलो भानू घर किरति के लाली हो गई || राधाष्टमी भजन || Sourav Sharma
बरसाने की शोभा उस पवित्र क्षण में और भी निराली हो उठी जब भानु (वृषभानु) और कीरति के घर श्री राधा का जन्म हुआ, जिसका यह भजन उत्सवपूर्ण वर्णन करता है। ब्रज में पुरुष और स्त्रियाँ बधाई देने को उमड़ पड़े, वेणु, शंख और शहनाई की ध्वनियों से वातावरण गूंज उठा, मानो दीपावली का उजाला फैल गया हो। भानु और नंदराय (नंद बाबा) संग नाचते हैं, यशोदा और कीरति का हृदय आनंद से भर जाता है, और दोनों घरों में उजियारा छा जाता है। श्री राधा, जिन्हें स्वयं गोविंद आराधते हैं, उनके जन्म से रसिक भक्तों का जीवन रस और भक्ति से परिपूर्ण हो उठा। यह भजन बरसाने की पावन भूमि, राधा-कृष्ण की लीला, और उनके जन्म की खुशी को भक्तिमय भाव से चित्रित करता है, जो ब्रज की आध्यात्मिक शोभा और भक्ति के उत्सव को जीवंत करता है।
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