ओराधे काहे नैन चुरावे मोते बच ना पावेगी भजन
ओराधे काहे नैन चुरावे मोते बच ना पावेगी भजन
कन्हैया क्यों ज्यादा इतरावे आफत तोपे आवेगी
राधे कहे नैन चुरावे मोते बच ना पावेगी
कन्हैया क्यों ज्यादा इतरावे आफत तोपे आवेगी
तेरी मेरी प्रीत पुरानी, कहे रार करे वृजरानी
कान्हा का तने मन में ठानी, उलटी बात करे मनमानी
राधिके कर मेरी पहचान, ना मोते फिर शरमावेगी
कन्हैया क्यों ज्यादा इतरावे आफत तोपे आवेगी
तेरा बरसाने क्या काम, चला जा उलटा तू नंदगाँव
तू राधा में तेरा श्याम, मिटाएले प्यारी भ्रम तमाम
रही ना तेरी अखियाँ में लाज की, दुनिया बात बनावेगी
राधे कहे नैन चुरावे मोते बच ना पावेगी
प्रेम की बात तोयें समझाऊँ, मुरलिया तेरे लिए बजाऊँ
मैं बातों में ना ही आऊँ, जल भर के अपने घर जाऊँ
मैं मार्ग रोक खड़ा हो जाऊँ, किशोरी कैसे जावेगी
कन्हैया क्यों ज्यादा इतरावे आफत तोपे आवेगी
छेड़े काहे मोहे मुरारी, मोते दूर हटो बनवारी
प्रेम की भिक्षा दे दो प्यारी, दुविधा खत्म करो अब सारी
ओ भूलन त्यागी हरि की लीला, सब की वाणी गावेगी
ओ राधे कहे नैन चुरावे मोते बच ना पावेगी
बच ना पावेगी ओ राधे बच ना पावेगी
राधे कहे नैन चुरावे मोते बच ना पावेगी
कन्हैया क्यों ज्यादा इतरावे आफत तोपे आवेगी
राधे कहे नैन चुरावे मोते बच ना पावेगी
कन्हैया क्यों ज्यादा इतरावे आफत तोपे आवेगी
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राधा-कृष्ण के प्रेम की यह छेड़छाड़, नोकझोंक और तकरार ब्रज की आत्मा में रची-बसी है। दोनों के बीच का संवाद प्रेम का सबसे सुंदर, चंचल और गहरा रूप है। राधा कृष्ण को छेड़ती हैं कि चाहे तुम कितने भी नैन चुरा लो, मुझसे बच नहीं पाओगे। तुम्हारा इतराना, तुम्हारी शरारतें, सब पर आफत ही आएगी, क्योंकि प्रेम के इस खेल में जीत अंततः सच्चे प्रेम की ही होती है।
कृष्ण की और राधा की प्रीत बहुत पुरानी है, लेकिन फिर भी दोनों के बीच रार और तकरार बनी रहती है। कृष्ण मनमानी करते हैं, उलटी-सीधी बातें करते हैं, लेकिन राधा भी अपनी पहचान, अपनी जगह जमाए हुए हैं। राधा कहती हैं कि कान्हा, तुम्हारी सारी चालाकियाँ मैं पहचानती हूँ, अब मुझसे शरमाने या छुपने का कोई फायदा नहीं। कृष्ण को उलाहना भी देती हैं कि बरसाने में तुम्हारा क्या काम, लौट जाओ अपने नंदगाँव। लेकिन कृष्ण भी कहाँ मानने वाले! वे राधा के भ्रम दूर करने की बात करते हैं, कहते हैं कि अब आँखों में लाज नहीं बची, दुनिया बातें बनाएगी, लेकिन प्रेम की राह में ये सब मायने नहीं रखता।
कृष्ण प्रेम की बातें समझाते हैं, मुरली की मधुर धुन राधा के लिए बजाते हैं, लेकिन राधा भी अपनी बातों में नहीं आतीं और जल भरने के बहाने निकल जाती हैं। कृष्ण रास्ता रोक लेते हैं, और राधा मुस्कुराकर पूछती हैं—अब कैसे जाऊँगी? यह प्रेम की मीठी तकरार, छेड़छाड़ और अपनापन दोनों के रिश्ते को और भी गहरा बना देती है।
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Author - Saroj Jangir
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